भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 361 में से

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पृष्ठ 138

१०६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । तिष्ठंस्तिष्ठन्तीं महाशान्तिमुच्चैरभिनिगदति ॥६॥ य ईशे पशुपतिः पशूनामिति हुत्वा वशामनक्ति शिरसि ककुदे जघनदेशे ॥ ७ ॥ अन्यतरां स्वधितिधारामनक्ति ॥८॥ अक्तया वपामुत्खनति ॥ ९ ॥ दक्षिणे पार्श्वे दर्भा- भ्यामधिक्षिप्त्यमुष्मै त्वा जुष्टमिति यथादेवतम् ॥ १०॥ निस्सालामित्युल्मुकेन त्रिः प्रसव्यं परिहरत्यनभिपरिहर- न्नात्मानम् ॥११॥ दर्भाभ्यामन्वारभते ॥१२॥ पश्चादुत्तर- तोऽग्नेः प्रत्यक्शीर्षीमुदक्पादीं निविध्यति ॥१३॥ सम- स्यै तन्वा भवेत्यन्यतरं दर्भमवास्यति ॥१४॥ अथ प्राणा- नास्थापयति प्रजानन्त इति ॥ १५ ॥ दक्षिणतस्तिष्ठन् रक्षोहणं जपति ॥१६॥ संज्ञप्तायां जुहोति—यद्वशा मायु- मक्रतोरो वा पद्भिराहत ॥ अग्निर्मा तस्मादेनसो वि- श्वान् मुञ्चत्वंहस इति ॥१७॥ उदपात्रेण पत्न्यभिव्रज्य वशा को करने वाला खड़ा होकर वास्तोष्पत्यादि चतुर्गणी महाशान्ति को उच्चैः, तीसरे सवन में, वशा के सम्मुख होकर जप करे ॥ ६ ॥ “य ईशे पशुपतिः पशूनां०” से आहुति करके वशा को शिर में लगावे ककुद में और जघन देश में ॥७॥ दोनों धारा के छुरिका की अन्य धारा को फेंके ॥८॥ अधिक्षिप्तधारा से वशा के वपा को निकाले ॥९॥ वशा के दक्षिण पार्श्व में डाभों से “प्रजापतये त्वा जुष्टमधिक्षिपामि” से यथा दैवत-अधिक्षिप्त करे ॥१०॥ “निस्सालां०”—से उल्मुक द्वारा तीन बार बायें होकर—वशा को लेवे ॥११॥ डाभों से शामित्र देश को ली जाती हुई पश्चात् अवस्थिता वशा को डाभों से स्पर्श करे ॥१२॥ अग्नि के पश्चिम उत्तर-पश्चिम की ओर शिर कियी हुई और उत्तर को पैर कियी हुई गिरवावे ॥१३॥ “समस्यै तन्वा भव०” जिन डाभों से वशा अन्वारब्धा हुई । उन दोनों से अलग एक अन्य विधि करे । वशा के नीचे डाले ॥१४॥ मारी जाने वाली वशा के दक्षिण भाग में खड़ा रह कर रक्षोहण अनुवाक का जप करे ॥१५॥॥१६॥ मारे जाने पर “यद्व शा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥१७॥ जलपात्र लेकर पत्नी जाकर

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