कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०७ मुखादीनि गात्राणि प्रक्षालयते ॥१८॥ मुखं शुन्धस्व देव- यज्याया इति ॥१९॥ प्राणानिति नासिके ॥२०॥ चक्षुरि- ति चक्षुषी ॥२१॥ श्रोत्रमिति कर्णौ ॥२२॥ यत्ते क्रूरं यदा- स्थितमिति समन्तं रज्जुघानम् ॥२३॥ चरित्राणीति पा- दान्समाहृत्य ॥२४॥ नाभिमिति नाभिम् ॥२५॥ मेढ्र- मिति मेढ्रम् ॥२६॥ पायुमिति पायुम् ॥२७॥ यत्ते क्रूरं यदा- स्थितं तच्छुन्धस्वेत्यवशिष्टाः पार्श्वदेशोऽवसिच्य यथार्थं व्रजति ॥ २८ ॥ वपाश्रपण्यावाज्यं स्रुवं स्वधितिं दर्भ- मादायाभिव्रज्योत्तानां परिवर्त्मानुलोमं नाभिदेशे द- र्भमास्तृणाति ॥२९॥ ओषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिं- सीरिति शस्त्रं प्रयच्छति ॥३०॥ इदमहमामुष्यायणस्यामु- ष्याः पुत्रस्य प्राणापानावपकृन्तामीत्यपकृत्य ॥ ३१ ॥ अधरप्रवस्केन लोहितस्यापहृत्य ॥ ३२ ॥ इदमहमामुष्या- मुख आदि अङ्गों को प्रक्षालन करे ॥१८॥ “मुखं शुन्धस्व०” इत्यादि, “प्राणान्” से नासिका के दोनों छिद्रों को प्रक्षालन करे ॥१९॥२०॥ “चक्षुः०” से दोनों आँखें ॥२१॥ “श्रोत्रं०” से दोनों कानों को ॥२२॥ “यत्ते क्रूरं यदास्थितं०” से गर्दन के सब बन्धन स्थानों को प्रक्षालन करे ॥२३॥ “चरित्राणि०” से दोनों पैरों को समिट कर प्रक्षालन करे ॥२४॥ “नाभिम्०” से नाभि को ॥२५॥ “मेढ्रम्०” से मेढ्र को ॥२६॥ “पायुं०” से पायु ( मल स्थान ) ॥२७॥ “यत्ते क्रूरं यदास्थितं तच्छु- न्धस्व०” से अवशिष्ट अङ्गों को, पार्श्व देश में अवसेचन कर जहाँ इच्छा हो जावे ॥२८॥ वपाश्रपणी दो, आज्य, स्रुव, उस्तुरा कुश इन को ले जाकर उत्तान वशा के लोमानुगत लक्षित नाभि देश में कुशों से आस्तरण करे ॥२९॥ “ओषधे त्रायस्व०” इत्यादि पढ़ कर और मारने वाले के हाथ में शस्त्र देवे ॥३०॥ “इदमहमामुष्यायणस्य०” इत्यादि से नाभि देश को काटे ॥३१॥ एवं नीचे के अप्रवस्क से लोहित को दूर कर ॥३२॥ “इदमहमामुष्या०” इत्यादि से दर्भ के अधर खण्ड से लोहित को छूकर दूसरे मंत्र से—लोहित लिप्त दर्भ खण्ड को (श्लेष्म