भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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१०८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यणस्यामुष्याः पुत्रस्य प्राणापानौ निखनामीत्यास्ये नि- खनति ॥ ३३॥ वपया द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथामिति वपा- श्रपण्यौ वपया प्रच्छाद्य ॥ ३४ ॥ स्वधितिना प्रकृत्यो- त्कृत्य ॥३५॥ आव्रस्कमभिघार्य ॥३६॥ वायवे स्तोकाना- मिति दर्भाग्रं प्रास्यति ॥३७॥ प्रत्यूष्टं रक्ष इति चरुमङ्गा- रे निदधाति ॥३८॥ देवस्त्वा सविता श्रपयत्विति श्रप- यति ॥३९॥ सुशृतां करोति ॥४०॥८॥४४॥ यद्यष्टापदी स्याद्गर्भमञ्जलौ सहिरण्यं सयवं वा य आत्मदा इति खदायां त्र्यरत्नावग्नौ सकृज्जुहोति ॥ १ ॥ विशस्य समवत्तान्यवद्येत् ॥ २ ॥ हृदयं जिह्वा श्येनश्च दोषी पार्श्वे च तानि षट् । यकृद्वृक्कौ गुदश्रोणी तान्येका- दश दैवतानि ॥३॥ दक्षिणः कपिल्लाटः सव्या श्रोणिर्गु- दञ्च यः॥ एतानि त्रीणि त्र्यङ्गानि स्विष्टकृद्भाग एव ॥४॥ श्रपण में धरे हुए को ) आस्य स्थान को निखनन करे ॥३३॥ “वपया द्यावा०” इत्यादि मंत्र से वपाश्रपणियों को वपा से ढाक देवे ॥३४॥ उस्तुरे से जहाँ से वपा को निकाला था उसी देश को आव्रस्क को अभिघारण करके ' वायवे०' इत्यादि से प्राशन करे। नाभि देश में पहिले धरा हुआ दर्भाग्नि को अनियत देश में फेके । ॥३५॥३६॥३७॥ “प्रत्यूष्टं रक्ष०” से चरु को आग पर धरे ॥३८॥ “देवस्त्वा सविता०” इत्यादि से श्रपण करे और भली भाँति पकावे ॥३९॥४०॥८॥४४॥ यह चौवालिसवीं कण्डिका पूरी हुई । “यद्यष्टापदी स्याद्०” इत्यादि से गर्त्त में तीन अन्तरियों को एकवार अग्नि में आहुति देवे ॥१॥ काट काट कर समवत्तों को टुकड़े करे । हृदय, जिह्वा, श्येन, दोषी, दोनों पार्श्व, ये छः यकृत्, वृक्क-दो, गुद- श्रोणी अर्थात् दोश्रोणी,, ये ग्यारह पशु के अंग लिये जाते हैं । इनमें से स्विष्टकृत् के लिये तीन अवदान ग्रहण किये जाते हैं । जैसे-दहिना बाहु, वाम जंघा, और अन्त्र विभाग । इन टुकड़ों में से चिह्नित टुकड़े