कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०९ तदवद्य प्रज्ञातानि श्रपयेत् ॥५॥ होष्यन् द्विर्द्विर्देवतानाम- वद्येत् ॥६॥ सकृत्सकृत्सौविष्टकृतानाम् ॥ ७ ॥ वपायाः समिद्ध ऊर्ध्वा अस्येति जुहोति ॥ ८ ॥ युक्ताभ्यां तृती- याम् ॥९॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥ १० ॥ जातवेदो वपया गच्छ देवांस्त्वं हि होता प्रथमो बभूथ । घृतस्याग्ने त- न्वा सम्भव सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः स्वाहा॥११॥ ऊर्ध्वं नभसं मारुतं गच्छतमिति वपाश्रपण्यावनुप्रहर- ति ॥१२॥ प्राचीमेकशृङ्गां प्रतीचीं द्विशृङ्गाम् ॥१३॥ पि- त्र्येषु वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैतान् वेत्थ निहितान् पराके। मेदसः कुल्या उप तान् स्रवन्तु सत्या एषामाशिषः सन्तु कामाः स्वाहा स्वधेति वपायास्त्रिर्जुहोति ॥१४॥ स- मवत्तानाम् ॥१५॥ स्थालीपाकस्य सम्राडस्यधिश्रयणं नाम सखीनामभ्यहं विश्वा आशाः साक्षीय ॥ कामोऽसि कामाय त्वा सर्ववीराय सर्वपुरुषाय सर्वगणाय सर्वकामाय को ले २ कर श्रपण करे ॥५॥ इसके अनन्तर जिस देवता के निमित्त पशु हो—उसी देवता के नाम चरु पकाना चाहिये। होम करते समय हृद- यादि के दो २ टुकड़े करा २ कर आहुति देवे ॥६॥ और एक २ बार स्विष्ट- कृत्-खण्डों की आहुतियाँ देवे ॥७॥ “वपायाः समिद्ध ऊर्ध्वा अस्य०” से एक मंत्र से—पहिली और दूसरे मंत्र से दूसरी आहुति करे ॥८॥ तीसरी आहुति मिले हुए मंत्रों से, चौथी “अनुमतिः सर्व०” से आहुति करे ॥९॥१०॥ “जातवेदो वपया०” इत्यादि से एक बार आज्य की आहुति करे ॥११॥ “ऊर्ध्वं नभसं मारुतं गच्छतं” से वपा श्रपणी में डाले ॥१२॥ पूर्वाग्र करके एक वपा श्रपणी से और पश्चिमाग्र करके दोनों वपाश्रपणी को साथ करके आहुति देवे ॥१३॥ परन्तु पितृ कार्य में— “वह वपां०” इत्यादि से वपा की तीन बार आहुतियाँ करे ॥१४॥ तब समवत्तों से आहुतियाँ करे ॥१५॥ “स्थाली पाकस्य०” इत्यादि से आहुति करे। फिर “अन्वद्य नो०” इत्यादि से आहुति देवे। “सम्राट्०” मंत्र से आज्य की आहुति देवे। और “सर्ववीराय०” से चार आहुतियाँ देने।