भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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११० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।


जुहोमि ॥ अन्वद्य नोऽनुमतिः पूषा सरस्वती मही । यत्करोमि तद्ध्यतामनुमतये स्वाहेति जुहोति ॥१६॥ क इदं कस्मा अदात् कामस्तदग्रे यदन्नं पुनर्मैत्विन्द्रियमिति प्रतिगृह्णाति ॥१७॥ उत्तमा सर्वकर्मा ॥१८॥ वशाया पाकयज्ञा व्याख्याताः ॥१९॥९॥४५॥ उतामृतासुः शिवास्त इत्यभ्याख्याताय प्रयच्छति ॥१॥ द्रुघणशिरो रज्ज्वा बध्नाति ॥२॥ प्रतिरूपं पलाशायो- लोहहिरण्यानाम् ॥३॥ येन सोमेति याजयिष्यन् सारू- पवत्समश्नाति ॥ ४ ॥ निधने यजते ॥ ५ ॥ यं याचामि यदाशासेति याचिष्यन् ॥६॥ मन्त्रोक्तानि पतितेभ्यो देवाः


वशा शान्ति कर्म समाप्त हुआ । जिस घर में वशा होती है—उस घर के धनादि का नाश होता है इसलिये शान्ति करनी चाहिये ॥१६॥ “क इदं कस्मा०” इत्यादि से प्रतिग्रह को ग्रहण करे ॥१७॥ सब ही कम्मों में— इस सूक्त से प्रतिग्रह आदि ग्रहण करे ॥१८॥ इस वशा के द्वारा पशु- पाकयज्ञों का व्याख्यान हुआ जानना ॥१९॥९॥४५॥ यह पैतालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ “उतामृतासुः०” इत्यादि से अभ्याख्यात (जिसको झूठा कह कर कि इसने प्रतिषिद्ध कर्म किये हैं) पुरुष के लिये मंथनी देवे ॥१॥ और द्रुघण शिर (पलाश सदृश) काला लोहा, तामा, सोना इनसे द्रुघण शिर की भाँति (प्रतिकृति) मणि बना कर कृष्ण लोह मणि, ताम्र मणि, हिरण्य मणि, द्रुघण प्रतिरूप बना कर अभिमंत्रण कर अ० पुरुष को बान्धे । परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि इस ग्रंथ में जहाँ २ एककार्य के लिये एक साथ अनेक कर्म करने का विधान है वहां २ उनमें से किसी एक को करे या सब को करे ॥२॥३॥ “येन सोम०” से याग करना हो तो सारूपवत्सा गौ के दूध को ऋत्विगगण तथा यजमान खावें । जिससे याग में विघ्न न हो ॥४॥ याग की समाप्ति में सोम देवत्य चरु बना कर आहुति करे ॥५॥ जिससे कुछ मांगे वह अवश्य देवे अस्वीकार न करे । ऐसी कामना के लिये सारूपवत्सा