कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १११ कपोत ऋचा कपोतममून्येतिरिति महाशान्तिमावपते ॥७॥ परीमेऽग्निमित्यग्निं गामादाय निशि कारयमाण- स्त्रिः शालां परिणयति ॥८॥ परोऽपेहि यो न जीव इति स्वप्नं दृष्ट्वा मुखं विमार्ष्टि ॥९॥ अतिघोरं दृष्ट्वा मैश्रधान्यं पुरोडाशमन्याशायां वा निदधाति ॥१०॥ पर्यावर्त इति पर्यावर्तते ॥११॥ यत्स्वप्न इत्यशित्वा वीक्षते ॥१२॥ विद्मा ते स्वप्नेति सर्वेषामप्ययः ॥१३॥ न हि ते अग्ने तन्व इति ब्रह्मचार्याचार्यस्यादहन उपसमाधाय त्रिः परिक्रम्य पुरोडाशं जुहोति ॥१४॥ त्रिरात्रमपर्यावर्तमानः शयीत ॥१५॥ नोपशयीतेति कौशिकः ॥१६॥ स्नानी- याभिः स्नायात् ॥१७॥ अपर्यवेतव्रतः प्रत्युपैयात् ॥१८॥ के दूध में पायस बनाकर अभिमंत्रण कर खावे ॥६॥ कपोत, उलूक यदि घर पर बैठे उसकी महाशान्ति कही है। कृत्या प्रहरण की भाँति इसकी महा- शान्ति करे ॥ शान्ति उदक में आवपन कर तब मातली की मूर्त्ति बना कर के रात्रि में उस शान्ति उदक से उस स्थान को “यतायै०” मंत्रों से प्रोक्षण करे जहाँ तक कपोत, उलूक बैठा हो ॥७॥ और “परीमेऽग्निं०” गौ को लाकर रात्रि में तीन बार उसे शाला की परिक्रमा करावे या कपोत स्थान के चारो ओर घूमावे ॥८॥ यदि बुरा स्वप्न देखे तो “परो- ऽपेहि यो न जीव”० से अपने मुख का मार्जन करे ॥९॥ यदि अत्यन्त घोर स्वप्न देखे तो मैश्रधान्य को पुरोडाशको अन्यशाला में रक्खे ॥१०॥ जिस करवट होकर सोने में स्वप्न देखा था उससे करवट बदल कर “पर्या- वर्त०” मंत्र का जप कर सोवे ॥११॥ आचार्य के मरने पर ब्रह्मचारी “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि से पाँच सामिधेनी की आहुति देकर तब दहन को तीन फेरा लगाकर “न हि ते अग्ने तन्व०” सूक्त के अन्त में पुरो- डाश की आहुति उस दहन में देवे ॥ और तीन रात तक गुरु की मृत्यु जहाँ हुई है उस स्थान के पार्श्व में ब्रह्मचर्यसे शयन करे ॥१५॥ कौशिका- चार्य्य कहते हैं—“न सोवे” ॥१६॥ “अपो दिव्या०” से चार ऋचाओं से स्नान करके तीन रात्रि घर पर आकर सोवे यह कौशिकाचार्य्य का