कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११३ वैवस्वतं यजते ॥३४॥ चतुःशरावं ददाति ॥३५॥ उत्तमर्णं मृते तदपत्याय प्रयच्छति ॥३६॥ सगोत्राय ॥३७॥ श्मशाने निवपति ॥३८॥ चतुष्पथे च ॥३९॥ कक्षानादीपयति ॥४०॥ दिवो नु मामिति वीप्रुबिन्दून्प्र- क्षालयति ॥४१॥ मन्त्रोक्तैः स्पृशति ॥४२॥ यस्योत्तम- दन्तौ पूर्वौ जायेते यौ व्याघ्रावित्यावपति ॥४३॥ मन्त्रो- क्तान् दंशयति ॥४४॥ शान्त्युदकश्लृतमादिष्टानामाश- यति ॥४५॥ पितरौ च ॥४६॥ इदं यत्कृष्ण इति शकुनिनाधि- क्षिप्तं प्रक्षालयति ॥४७॥ उपमृष्टं पर्यग्नि करोति ॥४८॥ आहुति करे॥३०॥आचार्य के लिये भी वैसा ही करे ॥३१॥ “देव हेडन०” से हवनीय में से किसी से आहुति करे ॥३२॥ खड्डा में धरे धान्य से सूर्य के लिये चरु पकावे ॥३३॥३४॥ उसी खदाशय धान्य में से चार शराव ( पुरवा ) धान्य ब्राह्मण को देवे ॥३५॥ यदि महाजन (कर्ज देने वाला) मर जावे तो ऋणी “अपमित्यप्रतीत्तं०” इत्यादि तीन सूक्तों से द्रव्य को अभिमंत्रण करके उसके पुत्र को रुपये देवे ॥३६॥ यदि उसके पुत्रादि न हों तो उसके गोत्रवाले को देवे ॥ यदि सगोत्री भी न हो तो मरघट में डाल देवे ॥ श्मशान के अभाव में चौराहे पर डाल देवे ॥३९॥ कक्षों को जलाकर प्रकाश करे ॥४०॥ “दिवो नु मां०” दो मंत्रों से (मेघ जल से नहाने की शान्ति है ) शरीर को प्रक्षालन करे ॥४१॥ “दिवो नु मां०” सूक्त से एक तैल को सर्वौषधि गन्ध, सोना-इनको अभिमंत्रण कर शरीर को उबटन से मले ॥ या आम्रादि वृक्षों से स्वयं गिरे हुए फलों से शरीर को स्पर्श करावे ॥४२॥ जिस बच्चे को ऊपर के दो अगले दाँत पहिले निकले तो “यौ व्याघ्रौ०” से व्रीहि आदि अग्नि में डाले ॥४३॥ व्रीहि, यव, तिल, माष को इकट्ठा करके दोनों निकले दाँतों से कटवावे ॥४४॥ व्रीहि आदि में से किसी एक को शान्ति जल से पका कर खावे ॥४५॥ बच्चे के माँ बाप भी खावे ॥४६॥ काले काक से छू जाने पर “इदं यत्कृष्ण०” शान्ति जल से प्रक्षालन करे ॥४७॥ और उल्मुक अभिमंत्रण करके काक मुख से अपमृष्ट पुरुष १५