कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । प्रतीचीनफल इत्यपामार्गेध्मेऽपामार्गीरादधाति ॥४९॥ यदर्वाचीनमित्याचामति ॥५०॥ यत्ते भूम इति विख- नति ॥५१॥ यत्त ऊनमिति संवपति ॥५२॥ प्रेहि प्रहरेति- कापिञ्जलानि स्वस्त्ययनानि भवन्ति ॥५३॥ प्रेहि प्रहर वा दावान् गृहेभ्यः स्वस्तये । कपिञ्जल प्रदक्षिणं शतप- त्राभि नो वद् ॥ भद्रं वद दक्षिणतो भद्रमुत्तरतो वद ॥ भद्रं पुरस्तान्नो वद् भद्रं पश्चात् कपिञ्जल ॥ शूनं वद दक्षिणतः शूनमुत्तरतो वद । शूनं पुरस्तान्नो वद शूनं पश्चात् कपिञ्जल ॥ भद्रं वद पुत्रैर्भद्रं वद गृहेषु च । भद्र- मस्माकं वद भद्रं नो अभयं वद ॥ आवदंस्त्वं शकुने भद्रमावद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः ॥ यदु- त्पतन्वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः । यौव- नानि महयसि जिग्युषामिव दुन्दुभिः ॥ कपिञ्जल प्रद- क्षिणं शतपत्राभि नो वदेति ॥ कापिञ्जलानि स्वस्त्यय- नानि भवन्ति ॥५४॥ यो अभ्यु बभ्रुणार्यसि स्वपन्त- को अग्नि की परिक्रमा करावे ( उपरि घुमाकर दूर में उसे फेंक देवे ) ॥४८॥ संक्रामक सब ही रोगों के संसर्ग दोष की शान्ति को कहते हैं । अपामार्ग की इध्मों को अग्नि में डाले ॥४९॥ 'यदर्वाचीनं०' से आच- मन करे ।५०॥ "यत्ते भूम" से ओषधि आदि को खने (जहां कहीं जिस ओषधि आदि को खनने का काम पड़े वहाँ इसी मंत्र से खनन करे ) ॥५१॥ और "यत्ते ऊनं०" से खने हुए गर्त को भर देवे ॥ ५२॥ “प्रेहि प्रहर०” इत्यादि से कापिञ्जल स्वस्त्ययन होते हैं ॥५३॥ कपिञ्जल पक्षी की बोली सुनकर ग्राम में या वन में किसी पक्षी कि बोली को सुनकर या स्वयं क्रुद्ध भाषण करके या दूसरे की बात सुनकर । उलूक, कपोतकी बोली पूर्व या उत्तर दिशा से सुनने पर लोक में निन्दित मानी जाती है, जो कुछ संसार में विरुद्ध सुने या देखे सब ही के लिये यह स्वस्त्ययन होता है ॥ ५४ ॥ मैदान में यदि सोवे, वन या शून्य घरमें या पर्वत