भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११५ मत्तिस पुरुषं शयानमगमत्स्व लम् ॥ अयस्मयेन ब्रह्मणाऽ- श्ममयेन वर्मणा पर्यस्मान्वरुणो दधदित्यभ्यवकाशे संवि- शत्यभ्यवकाशे संविशति ॥५५॥ ॥१०॥४६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥५॥ उभयतः परिच्छिन्नं शरमयं बर्हिराभिचारिकेषु॥१॥ दक्षिणतः सम्भारमाहरत्याङ्गिरसम् ॥२॥इङ्गिडमाज्यम्॥३॥ सव्यानि ॥४॥ दक्षिणापवर्गाणि ॥५॥ दक्षिणा प्रवण ईरिणे दक्षिणामुखः प्रयुङ्क्ते ॥६॥ साग्नीनि ॥७॥ अग्ने यत्ते तप इति पुरस्ताद्धोमाः ॥८॥ तथा तदग्ने कृणु जातवेद इत्याज्यभागौ ॥९॥ निरमुं नुद इति संस्थित- पर तब “यो अभ्य बभ्रूणा” इस ऋचा का जपकर सोवे ॥५५॥१०॥४६॥ यह छयालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥४६॥ इति अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का पञ्चम अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥५॥ अब अथर्ववेद विहित अभिचार कर्म को कहते हैं । यद्यपि मीमांसा ग्रन्थ में इसका निषेध है परन्तु मनुस्मृति में विहित करके लिखा गया है । दोनों ओर मूल और अग्र भाग कटे शरों से आभिचारिक वेदिका अस्तरण करना चाहिये ॥१॥ आङ्गिरस कल्प के अनुसार प्रयोजनीय सामग्रियों को दक्षिण भाग में लाकर धरे ॥२॥ दक्षिण दिशा में मण्डप बनवावे उसमें यथोक्त विधि से पताका तोरणों से सुसज्जित दरवाजे बनवावें । इङ्गिड को आज्य करे । वाम से आरम्भ कर दक्षिण में आभि- चारिक कर्मों की समाप्ति करे ॥३॥४॥५॥ वेदि दक्षिण को ढालुआ हो, दक्षिण मुख करके कर्त्ता कर्म करने में प्रवृत्त होवे ॥६॥ जितने कर्म हों सब अग्नि के साथ हों ॥७॥ “अग्ने यत्ते०” इत्यादि पाँच सूक्त, पाँच अपत्य और पाँचजन्य होते हैं । इनसे पुरस्तात् होमों को करे ॥८॥९॥ और “तदग्ने कृणु जातवेद०” इत्यादि सूक्त से आज्यभाग की दो ऋचायें ॥९॥ “निरमुं नुद” इत्यादि सूक्त से संस्थित होमों को करे ॥१०॥ अब अभि-