कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । होमाः ॥१०॥ कृत्तिकारोकारोधावाप्येषु ॥११॥ भर- द्वाजप्रवस्केनाङ्गिरसं दण्डं वृश्चति ॥१२॥ मृत्योरहमिति बाधकोमादधाति ॥१३॥ य इमामयं वज्र इति द्विगुणा- मेकवीरान्संनह्य पाशान्त्रिमुष्टितृतीयं दण्डं सम्पात- वत् ॥१४॥ पूर्वाभिर्बध्नीते ॥१५॥ वज्रोऽसि सपत्नहा स्वयाद्य वृत्रं साक्षीय । त्वामद्य वनस्पते वृक्षाणामुद- युष्महि ॥ स न इन्द्र पुरोहितो विश्वतः पाहि रक्षसः । अभि गावो अनूषताभि द्युम्नं बृहस्पते। प्राण प्राणं त्रयस्वा- सो असवे मृड ॥ निर्ऋते निर्ऋत्या नः पाशेभ्यो मुञ्च ॥ इति दण्डमादत्ते ॥१६॥ भक्तस्याहुतेन मेखलाया ग्रन्थि- चार प्रयोग करने के लिये काल का नियम कहते हैं। कृत्तिका-नक्षत्र में अरोध कृष्णपक्ष अरोधकः, अमावास्या के साथ-योग होना चाहिये । इन समयों में अभिचार कार्य होना चाहिये कृत्तिका औरोध में । अवाप्य ग्रहण विधान की समाप्ति तक समझने के लिये । अभ्या- तानान्त होम के पश्चात् "दूष्या दूषिरसि०" इस सूक्त से तिलक मणि को लाकर अभिमंत्रण कर इस मणि को कर्म कराने वाले, कर्त्ता और सदस्य प्रत्येक व्यक्ति बाँध लेवें-आत्मरक्षा के लिये ॥११॥ अब दीक्षा कही जाती है। शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि में अपराह्न समय अभ्या- तानान्त तक कर्म करके "द्यावापृथिवी उर्वन्तरिक्षं ०" सूक्त और "कनकरजत०" सूक्त-इन दो सूक्तों से कर्त्ता बास के दण्ड को काटे ॥१२॥ "मृत्योरहं०" से बाधक (व्याधिघातिक) समिधाओं का आधान करे ॥१३॥ "य इमां देवो मेखलां०" पञ्च सूक्त इस सूक्त से मेखला धर कर । "अयं वज्र०" इस सूक्त से दण्ड को रख कर "य इमां०" ऋचा से मेखला कमर में बांधे "वज्रोऽसि०" सूक्त से दण्ड को ग्रहण करे ॥ "नमो नमस्कृद्भ्य०" से सप्तर्षियों का उपस्थान करे-शाला के बाहर । तब शाला के भीतर जाकर व्रतादानीय समिधों को आधान करे । (शान्तवृक्षों की) और व्रतश्रावण वहीं करे, अभ्यातानादि उत्तर तंत्र करे ॥ एवं दीक्षित तीन रात तक भोजन न करे ॥ तीन रात बीत जाने