भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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मालिम्पति ॥१७॥ अयं वज्र इति बाह्यतो दण्डमूर्ध्व- मवागग्रं तिसृभिरन्वृचं निहन्ति ॥१८॥ अन्तरुपस्पृ- शेत् ॥१९॥ यदश्नामीति मन्त्रोक्तम् ॥२०॥ यहपात्रमाहन्ति फड्ढतोऽसाविति ॥२१॥ इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य प्राणापानावप्यायच्छामीत्यायच्छति ॥२२॥ ये अमावास्यामिति संनह्य सीसचूर्णानि भक्तेऽलङ्कारे ॥२३॥ पराभूतवेणोर्यष्ट्या बाहुमात्राद्यालङ्कृत्याहन्ति॥२४॥ द्यावापृथिवी उर्विति परशुपलाशेन दक्षिणा धावतः पदं वृश्चति ॥२५॥ अन्वक्तिस्तिर्यक्तिः ॥२६॥ अक्ष्णया संस्थाप्य ॥२७॥ आव्रस्कान्यांशूनपलाशमुपनह्य अष्टेऽभ्य- पर कृष्णपक्ष के पड़िवा को कर्म होगा ॥१४॥१५॥१६॥ पूर्वोक्त दण्ड को लेकर मेखला के गाँठ को “आहुतास्यभिहुता०” इस ऋचा को पढ़ कर प्रति दिन लीपे ॥१७॥ “अयं वज्र०” से शाला के बाहर दण्ड को पकड़ कर अग्रभाग को तीन ऋचा में से प्रत्येक ऋचा को पढ़ २ कर मारे ॥१८॥ और शालाके भीतर जल का स्पर्श करे ॥१९॥ “यद- श्नामि यद् गिरामि०” इन दो ऋचा से भोजन करे, और “यत्पिबामि०” ऋचा से जल पीवे ॥२०॥ और “फड्ढतोऽसौ०” से भोजन (यहाँ असौ की जगह शत्रु का नाम बोले) पात्र को मारे ॥२१॥ फिर दण्ड को पकड़ कर “इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य०” इत्यादि पढ़ कर “आमुष्यायणस्य” की जगह शत्रु का नाम लेकर मेखला के गाँठ को दृढ़ करे ॥२२॥ “येऽमावास्यां०” से सीस (सिसा) को चूर्ण करके शत्रु के भोजन या वस्त्रालंकारादि में डाल देवें ॥२३॥ गिरे हुए बाँस की हाथ भर की अलंकृत छड़ी से शत्रु को मारे ॥२४॥ “द्यावापृथिवी उरु०” इत्यादि से परशु वृक्ष के पत्ते से दक्षिणादि दौड़ते शत्रु के पैर की जगह को हलका काटे ॥२५॥ छेदन का नियम यह है कि-अनुपद की रेखाओं से टेढ़े त्रिकोण में एक २ को तीन २ बार सूक्त को पढ़े ॥२६॥ कोण द्वारा संस्थापन करके उस पैर चिह्न से धूलि लेकर वध के पत्ते में बाँध कर के आष्ट्र में डाल देवे ॥२८॥ शब्द होने पर शत्रु मर