भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १११९ दहति ॥४०॥ एकपदाभिरन्योऽनुतिष्ठति ॥४१॥ अङ्गुशः सर्वहुतमन्यम् ॥ ४२ ॥ पश्चादग्नेः शरभृष्टीर्निधायोदग्व- जस्त्या स्वेदजननात् ॥४३॥ निवृत्य स्वेदाल्लङ्कृता जुहोति । ॥४४॥ कोश उरः शिरोऽवधाय पदात्पांसून् ॥४५॥ पश्चा- दग्नेर्लवणमृडीचीस्तिस्रोऽशोतीर्विकर्णीः शर्कराणाम्॥४६॥ विषं शिरसि ॥४७॥ बाधकेनावागग्रेण प्रणयन्नन्वाह ॥४८॥ पाशे स इति कोशे ग्रन्थीनुद्ग्रथ्नाति ॥ ४९ ॥ आमुमित्या- दत्ते ॥५०॥ मर्मणि खादिरेण स्रुवेण गर्तं खनति ॥ ५१ ॥ बाहुमात्रमतीव इति शरैरवज्ज्वालयति ॥५२॥ अवधाय सञ्चित्य लोष्टं स्रुवेण समोप्य ॥५३॥ अमुमुन्नैषमित्युक्ता- वलेखनीम् ॥५४॥ छायां वा ॥ ५५ ॥ उपनिनयते ॥५६॥ अन्वाह ॥५७॥१॥४७॥ “अग्ने यत्ते तपः०” इत्यादि पाँच सूक्तों से उपस्थान करे । और अन्य कर्त्ता ८ टुकड़ा करके प्रत्येक ऋचा से आहुति देवे । और लोग एक पैर से खड़े रहें । अग्नि के पश्चात् भाग में शरभृष्टी को डाल कर । उत्तर तंत्र क्रिया करने को जाने में जो पसीना आया हो तो पसीना सूख जाने पर उस पसीने से अभ्यक्त शरभृष्टी से आठ २ आहुतियाँ प्रत्येक ऋचा से देवे ॥४४॥४५॥ अभ्यातानान्त करके हृदय और शिर पर धूलि डाल कर, अग्नि के पश्चिम भाग में लवणरुजका को और २४० शर्करा कोश में धर कर विष को शिर पर धरे ॥४५॥४६॥४७॥ व्याधिघातक दण्ड से प्रेरण करता हुआ प्रति कोश को पीछे से कहे ॥४८॥ “पाशे स बद्ध०” से कोश में गांठें बाँधे । “आमुं०” से लेवे ॥४९॥५०॥ मर्म में खादिर स्रुव से गर्त को बाहुमात्र खनन करे । और “अतीव य०” से शरों से जलावे ॥५१॥५२॥ धूलि को गर्त में स्रुव से डाल कर ॥५३॥ “अमुमु- न्नैषं०” इस मंत्र से उक्तावलेखनी को, या शत्रु की छाया को दार्भुष से विद्ध करे और शत्रु के पास के जल से मार्जन करे ( भरद्वाज प्रत्नस्क से ) ॥५४॥५५॥१॥४७॥ यह सैंतालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥