कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १११९ दहति ॥४०॥ एकपदाभिरन्योऽनुतिष्ठति ॥४१॥ अङ्गुशः सर्वहुतमन्यम् ॥ ४२ ॥ पश्चादग्नेः शरभृष्टीर्निधायोदग्व- जस्त्या स्वेदजननात् ॥४३॥ निवृत्य स्वेदाल्लङ्कृता जुहोति । ॥४४॥ कोश उरः शिरोऽवधाय पदात्पांसून् ॥४५॥ पश्चा- दग्नेर्लवणमृडीचीस्तिस्रोऽशोतीर्विकर्णीः शर्कराणाम्॥४६॥ विषं शिरसि ॥४७॥ बाधकेनावागग्रेण प्रणयन्नन्वाह ॥४८॥ पाशे स इति कोशे ग्रन्थीनुद्ग्रथ्नाति ॥ ४९ ॥ आमुमित्या- दत्ते ॥५०॥ मर्मणि खादिरेण स्रुवेण गर्तं खनति ॥ ५१ ॥ बाहुमात्रमतीव इति शरैरवज्ज्वालयति ॥५२॥ अवधाय सञ्चित्य लोष्टं स्रुवेण समोप्य ॥५३॥ अमुमुन्नैषमित्युक्ता- वलेखनीम् ॥५४॥ छायां वा ॥ ५५ ॥ उपनिनयते ॥५६॥ अन्वाह ॥५७॥१॥४७॥ “अग्ने यत्ते तपः०” इत्यादि पाँच सूक्तों से उपस्थान करे । और अन्य कर्त्ता ८ टुकड़ा करके प्रत्येक ऋचा से आहुति देवे । और लोग एक पैर से खड़े रहें । अग्नि के पश्चात् भाग में शरभृष्टी को डाल कर । उत्तर तंत्र क्रिया करने को जाने में जो पसीना आया हो तो पसीना सूख जाने पर उस पसीने से अभ्यक्त शरभृष्टी से आठ २ आहुतियाँ प्रत्येक ऋचा से देवे ॥४४॥४५॥ अभ्यातानान्त करके हृदय और शिर पर धूलि डाल कर, अग्नि के पश्चिम भाग में लवणरुजका को और २४० शर्करा कोश में धर कर विष को शिर पर धरे ॥४५॥४६॥४७॥ व्याधिघातक दण्ड से प्रेरण करता हुआ प्रति कोश को पीछे से कहे ॥४८॥ “पाशे स बद्ध०” से कोश में गांठें बाँधे । “आमुं०” से लेवे ॥४९॥५०॥ मर्म में खादिर स्रुव से गर्त को बाहुमात्र खनन करे । और “अतीव य०” से शरों से जलावे ॥५१॥५२॥ धूलि को गर्त में स्रुव से डाल कर ॥५३॥ “अमुमु- न्नैषं०” इस मंत्र से उक्तावलेखनी को, या शत्रु की छाया को दार्भुष से विद्ध करे और शत्रु के पास के जल से मार्जन करे ( भरद्वाज प्रत्नस्क से ) ॥५४॥५५॥१॥४७॥ यह सैंतालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥
१२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । भ्रातृव्यक्षयणमित्यरण्ये सपत्नक्षयणीरादधाति ॥१॥ ग्राममेत्यावपति ॥२॥ पुमान् पुंस इति मन्त्रोक्तमभिहुता- लङ्कृतं बध्नाति ॥३॥ यावन्तः सपत्नास्तावतः पाशानि- ङ्गिडालङ्कृतान्सम्पातवतोऽनूक्तान्ससूत्रांश्चम्वा मर्मणि निखनति ॥४॥ नावि प्रैणान्नुदस्व कामेति मन्त्रोक्तं शाखया प्रणुदति ॥५॥ तेऽधराञ्च इति प्रप्लावयति ॥६॥ बृहन्नेषामि- स्यायन्तं शप्यमानमन्वाह॥७॥ वैकङ्कतेनेति मन्त्रोक्तम्॥८॥ ददिहींति साग्नीनि ॥९॥ देशकवडु प्रदक्षिणाति ॥१०॥ तेऽवदन्निति नेतॄणां पदं वृश्चति ॥११॥ अन्वाह ॥१२॥ ब्रह्मगवीभ्यामन्वाह ॥१३॥ चेष्टाम् ॥१४॥ विचृतति ॥१५॥ अरण्य में जाकर “भ्रातृव्यक्षयणं०” से शत्रुक्षयणीय अश्वत्थ, कृकलास, एरण्ड, श्लेष्मान्तक, खदिर, शर की समिधाओं का आधान करे ॥१॥ तब ग्राम में आकर व्रीहि, यव, तिल इनको अग्नि में हवन करे ॥२॥ खैर के वृक्ष से उत्पन्न अश्वत्थ के मणि को “पुमान्पुंस०” से आहुति देकर अलंकृत कर बाँधे ॥३॥ जितने शत्रु हों उतने ही पाशों को इङ्गिडों से अलंकृत करके सम्पात वाला करके प्रकृत सूक्त से अनूक्त के साथ सूत से सम्बन्ध करके मर्मों को निखनन करे ॥४॥ “नावि प्रैणान्नुदस्व काम” से दोनों को अश्वत्थ शाखा से प्रणुदन करे ॥५॥ “तेऽधराञ्च०” से नाव को जल से भर देवे ॥६॥ शत्रु या आक्रु- ष्यमाण पुरुष अग्नि के सम्मुख आता हो तो “बृहन्नेषां०” मंत्र पढ़े ॥७॥ वैकङ्कत स्रुव से मंत्रोक्त को आहुति देवे ॥८॥ कृक- लास कर्म, शरभृष्टि कर्म, शत्रुक्षयणीय कर्म, ६ गाँव में आकर करले ६ कर्म तीन पाश कर्म, विकङ्कत कर्म २१ तंत्र होते हैं ॥९॥ सूक्त के अन्तिम मंत्र से सर्प छत्र को चूर्ण करे ॥१०॥ “तेऽवदन्न०” से ब्राह्मण गो-नेतृ के पद को काटे या नेताओं को कहे ॥११॥१२॥ “नैतां ते देवा” इति एका ब्रह्मगवी, दूसरी “श्रमेण तपसा०” इन दो ब्रह्मगवी ऋचाओं को नेताओं को कहे । सदा गोहरण और मारण क्रिया में ब्रह्म- चारी जप करे ॥१३॥ मारण, विशसन, अधिश्रयण, भक्षणादि द्वेष्य
ऊबध्ये ॥१६॥ श्मशाने ॥१७॥ त्रिरमूनूहनस्वेत्याह ॥१८॥ द्वितीयायाश्मानमूबध्ये गूहयति ॥१९॥ द्वादशरात्रं सर्व- व्रत उपश्राम्यति ॥२०॥ द्विरुदिते स्तुतः ॥२१॥ अवाग- ग्रेण निवर्तयति ॥२२॥ उप प्रागादिति शुने पिण्डं पाण्डुं प्रयच्छति ॥२३॥ तार्क्षं बध्नाति ॥२४॥ जुहोति ॥२५॥ आदधाति ॥२६॥ इदं तद्युजे यत्किं चासौ मनसेत्याहि- ताग्निं प्रतिनिर्वपति ॥२७॥ मध्यमपलाशेन फलीकरणा- ञ्जुहोति ॥२८॥ निरमुमित्यङ्गुष्ठेन त्रिरनुप्रस्तृणाति ॥२९॥ शरं कट्टिन्दुकोष्ठैरनुनिर्वपति ॥३०॥ लोहिताश्वत्थपला- शेन विषावध्वस्तं जुहोति ॥३१॥ त्वं वीरुधामिति मूत्र- गौ में चेष्टा, वध्य के निमित्त हवि करना ॥१४॥१५॥ ऊबध्य को श्मशान में धर कर उस पर बैठ कर "श्रमेण तपसा०” अनुवाक का जप करे । १२ रात तक प्रति दिन जप करे । उसके बाद दो बार सूर्य के उदय होने पर अर्थात् चौदहवां दिन—शत्रु मारा गया जानो ॥२१॥ तब बाँस के दण्ड के अग्रभाग से निवर्तन करे ॥२२॥ "उपप्रागात्०” से श्वेत मिट्टी को अभिमंत्रण कर कुत्ते को देवे ॥२३॥ पलाशमणि लाकर अभिमंत्रण कर उसे बाँधे ॥२४॥ इङ्गिड की आहुति देवे ॥२५॥ समिदाधान करे ॥२६॥ "इदं तद्युजे यत्किंचासौ मनसा०” से आहिताग्नि के प्रति अभिचार करे ॥२७॥ "इदं तद्युजे०” सूक्त के पांच ऋचा से पलाश के मध्यम पत्र से चावल के गुण्डे से आहुति देवे ॥२८॥ "निरमुं०” से अग्नि के पश्चिम भाग में अंगूठे से तीन तह आस्तरण करे ॥२९॥ शर से स्तरण करे, ओडेक, कोष्ट, इङ्गिड, इनमें से एक को हटा देवे और शेष की आहुति देवे ॥३०॥ लाल अश्वत्थ के पत्ते से विषावध्वस्त की आहुति करे ॥३१॥ बाहर लवनादि प्रतिष्ठापनान्त तक करके उस अग्नि को विकाश करे और शर से अग्नि का प्रणयन करे । "निरमुं०” सूक्त से स्तरण करके फिर मंत्र से स्तरण करे । एवं "निरमुं०” सूक्त द्वारा अभ्यातानान्त करके इङ्गिड की आहुति देवे । "त्वं वीरुधां०” से मल मूत्र को बछड़े के शेफ के चमड़े में क्रकच से धर कर बाधक से पीस १६
१२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । पूरीषं वत्सशेप्यायां ककुचैरपिधाप्य संपिष्य निखनति ॥३२॥ शेप्यानण्डे ॥ ३३ ॥ शेप्यायाम् ॥ ३४ ॥ यथा सूर्य इत्यन्वाह ॥३५॥ उत्तरया यांस्तान् पश्यति ॥३६॥ इन्द्रो- तिभिरग्ने जातान्यो नस्तायदिप्सति यो नः शपादिति वैद्युदतीः ॥३७॥ सान्तपना इत्यूर्ध्वशुषीः ॥३८॥ ग्रंसश्रुतं पुरोडाशं ग्रंसविलीनेन सर्वहुतम् ॥३९॥ उदस्य श्यावा- वितीषीकाञ्जिमण्डूकं नोललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां सकक्षं बद्ध्वोष्णोदके व्यादाय प्रत्याहुति मण्डूकमपनुदत्य- भिन्युब्जति ॥४०॥ उपधावन्तमसदन् गाव इति काम्पिलं संनह्य क्षीरोत्सिक्ते पाययति लोहितानां चैक- शम् ॥ अशिशिशोः क्षीरौदनम् ॥४२॥ आमपात्रम
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२३ सपत्नहनमित्यृषभं सम्पातवन्तमतिसृजति ॥ १ ॥ आश्वत्थीरवपन्नाः ॥२॥ स्वयमिन्द्रस्यौज इति प्रक्षाल- यति ॥३॥ जिष्णवे योगायेत्यपो युनक्ति॥४॥ वातस्य रंहितस्यामृतस्य योनिरिति प्रतिगृह्णाति ॥५॥ उत्तमाः प्रताप्याधराः प्रदायैनमेनानधराचः पराचोऽवाचस्तपसस्त- मुन्नयत देवाः पितृभिः संविदानः प्रजापतिः प्रथमो देवता- नामित्यतिसृजति ॥ ६ ॥ इदमहं यो मा प्राच्या दिशो- ऽघायुरभिदासार्दपवादीदिषूगुहः तस्येमौ प्राणापानावप- क्रामामि ब्रह्मणा ॥७॥ दक्षिणायाः प्रतीच्या उदीच्या ध्रुवाया व्यध्वाया ऊर्ध्वायाः ॥८॥ इदमहं यो मा दिशाम- न्तर्देशेभ्य इत्यपक्रामामीति ॥९॥ एवमभिष्ठा ॥१०॥ नापो- क्षीरौदन शत्रु के लिये खाने को देवे और कच्चे पात्र में हाथ धोवे ॥४१॥४२॥४३॥२॥४८॥ यह अड़तालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ “सपत्नहनं०” सूक्त से सम्पातवन्त करके ऋषभ ( वृषभ ) को वृषो- त्सर्ग की भाँति छोड़े। इसका विधि आगे कहा जाता है। स्वयं पतित (अपने आप गिरे हुए) अश्वत्थ की लकड़ियों की समिधा बनावे ॥१॥२॥ “स्वयमिन्द्रस्यौज०” से प्रक्षालन करे ॥३॥ “जिष्णवे योगाय०” से जल लावे ॥ “वातस्य रंहितस्यामृतस्य योनिः०” से जल ग्रहण करे ॥५॥ उद्- वज्रों के विधान को कहते हैं । “इन्द्रस्यौज०” से दूर्वा डाले घट को जल से प्रक्षालन करे । “जिष्णवे योगाय” इत्यादि से छः जल भरे घड़ों को जल के पास रक्खे । एवं “इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” से आठ ऋचा वाले कल्पज सूक्त से जल में घड़े को डाले । “इदमहं०” से घड़े से उदक में “इदमहं०” सूक्त से घड़े के मुख को जल में डुबावे और “इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” सूक्त से घड़े में जल भर कर लौट आकर “इदमहं०” सूक्त से उसे मण्डप में स्थापना करे--इस भाँति अभिचार कर्म में जल का लाना होता है । जिस नियम से वज्र प्रहरण किया जाता है उसे कहते हैं । “इन्द्रस्य०” इत्यादि से सब क्रियाओं को करके “इदमहं०” से स्थापनान्त तक करके “अग्नेर्भाग०” इत्यादि आठ
१२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । हननिवेष्टनानि सर्वाणि खलु शश्वद्धूतानि ॥ ११ ॥ ब्राह्मणाद्वज्रमुद्यच्छमानाच्छङ्कन्ते मां हनिष्यसि मां हनि- ष्यसीति तेभ्योऽभयं वदेच्छमग्नये शं पृथिव्यै शमन्त- रिक्षाय शं वायवे शं दिवे शं सूर्याय शं चन्द्राय शं नक्षत्रेभ्यः शं गन्धर्वाप्सरोभ्यः शं सर्पेतरजनेभ्यः शिवं मह्यमिति ॥१२॥ यो व आपोऽपां यं वयमपामस्मै वज्र- मित्यन्वृचमुदद्वज्रान् ॥१३॥ विष्णोः क्रमोऽसीति विष्णुक्रमान् ॥१४॥ ममाग्ने वर्च इति बृहस्पतिशिरसं पृषातकेनोपसिच्याभिमन्त्र्योपनिदधाति ॥१५॥ प्रति- जानन्नानुव्याहरेत् ॥१६॥ उत्तमेनोपद्रष्टारम् ॥१७॥ उदेहि वाजिनित्यर्धर्चेन नावं मज्जतीम् ॥१८॥ समिद्धो- ऋचाओं से दो करना आधे को घड़े में करके आधे को भाजन में धर के भाजन को अग्नि पर तपावे और घड़े को अन्य पुरुष को देकर “अग्नेर्भाग०” आठ ऋ० से तपावे । बाहर दक्षिणाभिमुख होकर बैठ भाजन को आगे करके “वातस्य रंहितस्य०” मंत्र से जल को लेकर “समग्नय०” कल्पज सूक्त से सब भूतों के लिये अभय कहना । और “यो व आपोऽपां०” से वज्र को फेके “अनाधराच पराच” इस कल्पज ऋचा से भाजन, उदक को भूमि पर लावे ॥ “यं वयं०” इस सूक्त ही से “अपामस्मै वज्रं०” इस एक ऋ० से ऐसा ही करे । “इन्द्रस्यौज०” इत्यादि करे ॥ “विष्णोः क्रमोऽसि” १२ ऋचाओं में से प्रत्येक ऋचा से विष्णु क्रमों को शत्रु के सम्मुख करे । सब विधान से बृहस्पति शिर ओदन को शत्रु के लिये देवे ॥ “ममाग्ने वर्च'० इस सूक्त से उस को पृषातक से सिंचन करके “तस्यौदनस्य०” इस अर्ध सूक्त से अभि- मंत्रण करके देवे । सूक्त से अभिस्रुत करने पर सूक्त से सम्पातवन्त करे ॥ “उदेहि नावं” शत्रुओं को कहे । शङ्कुसहित पाशों को अभिमंत्रण करके वन में डाल देवे । शत्रु के पदचिन्ह को छेदन करे । पाशों को भाष्ट्र में डाले। कच्चे पात्र पर शत्रु के हाथ प्रक्षालन करे ॥ वृषभको लाकर शत्रु के घरों की ओर उसे छोड़े॥ लाल शालि के क्षीरौ
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२५
ऽग्निर्य इमे द्यावापृथिवी अजैष्मेत्यधिपाशानादधाति ॥१९॥ पदे पदे पाशान् वृश्चति ॥२०॥ अधिपाशान् बाधकाञ्छङ्कूंस्तान् संक्षुद्य संनह्य भ्रष्ट्रेऽभ्यस्यति ॥२१॥ अशिशिषोः क्षीरौदनादीनि त्रीणि ॥२२॥ गर्तेध्मा- वन्तरेणावलेशनीं स्थाणौ निबध्य द्वादशरात्रं सम्पातान- भ्यतिनिनयति ॥२३॥ षष्ठ्योदवज्रान्प्रहरति ॥२४॥ सप्तम्याचामति ॥२५॥ यश्च गामित्यन्वाह ॥२६॥ निर्दु- र्मण्य इति संधाव्याभिमृशति ॥२७॥३॥४९॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥ स्वस्तिदा ये ते पन्थान इत्यध्वानं दक्षिणेन प्रका-
दन को लाकर अभिमंत्रण करके शत्रु के लिये देवे ॥ शत्रु की मूर्त्ति मट्टी की बनाकर वेदि के मध्य में ऊँचे स्थाणु में बाँध देवे और उसके शिर पर घी के सम्पातों को चुलावे ॥ “यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च”० से उदवज्रों से उक्त विधान से शत्रु के शिर पर मारे ॥ “योऽन्नादोऽन्नपतिः०” ऋचा से शत्रु को मन से आचमन करे तो स्वयं शत्रु का मरण हो जावेगा । “यश्च गां पदा स्फुरति ऋग्द्वयाधिकारः” तीन ऋ० से शत्रु को देखकर पढ़े ॥ अवभृथ में स्नान कर “निर्दुर्मण्य०” से सर्वौषधियों से अपने को अभिमर्शन करे ॥ अभिचार करके इस शान्ति को कर्त्ता करे ॥ अभिचार पद्धति समाप्त हुई ॥ इस प्रयोग से मरण, बन्धन या बेहोश गिर जाना, पागल होना, होता है ।६।७।८।९।१०।११।१२।१३।१४।१५।१६ ।१७।१८।१९।२०।२१।२२।२३।२४।२५।२६।२७॥३॥४९॥ यह उनचासवी कण्डिका समाप्त हुई ॥४९॥ और अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के छठा अध्याय का भाषानुवाद भी समाप्त हुआ ॥६॥ अब स्वस्त्ययन कर्म को कहते हैं । व्याघ्र, चोर, हुराल, चरक, सिंह आदि बनैले हिंसक जन्तुओं का मार्ग में चलते समय भय हो तो “स्व- स्तिदा ये ते०” इत्यादि मंत्रों को मार्ग में जाने के पहिले दहिना पग आगे कर चले और गौ को आगे कर स्वयं उसके पीछे-पीछे चले । मार्ग में कीलक गाड़ता उखाड़ता हुआ घर से जंगल को जावे ॥१॥ जल भरे
१२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मति ॥१॥ व्युदस्यत्यसंख्याताः शर्कराः ॥२॥ तृणानि छित्त्वोपतिष्ठते ॥३॥ आरेऽस्मूः पारे पातं नो य एनं परि- षीदन्ति यदायुधं दण्डेन व्याख्यातम् ॥४॥ दिष्ट्या मुखं विमाय संविशति ॥५॥ त्रीणि पदानि प्रमायोत्तिष्ठति ॥६॥ तिस्रो दिष्टीः ॥७॥ प्रेतं पादावित्यवशास्य ॥८॥ पाययति ॥९॥ उपस्थास्त इति त्रीण्योप्यातिक्रामति ॥१०॥ स्वस्ति मात्र इति निश्युपतिष्ठते ॥११॥ इन्द्रमह- मिति पण्यं सम्पातवदुत्थापयति ॥१२॥ निमृज्य दिग्यु- क्ताभ्यां दोषो गाय पातं न इति पश्चानडूह्यो यमो घड़े को अभिमंत्रण करके गोचर भूमि में गौ को ले जावे और धूलि को ढेर कर उसमें से आधे को दहिने हाथ से उठा कर फेके । और एक-एक दर्भ आदि तृणों को तोड़ तोड़ कर फेके और इन्द्र देवता के लिये पाक- यज्ञ के विधान से बलि देवे और उपस्थान करे ॥ मार्जन कर अभिमंत्रण करके राजा को देवे और “आरेऽस्मूः” इत्यादि मंत्र से खड्गादि हथियार को ग्रहण करे ॥४॥ तर्जनी अङ्गुली से मुख को माप कर रात्रि में शयन करे ॥५॥ और प्रातः काल उठकर सूक्त का जप कर तीन पग जप कर तब अपने काम में प्रवृत्त होवे ॥६॥ और तीन प्रादेश मात्र जमीन नाप करके चले । मार्ग में जाने के लिये सम्बल ले लेवे । एवं “प्रेतं पादौ०” इत्यादि ऋचा से अभिमंत्रण कर सम्बल में से थोड़ा ब्राह्मण
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२७ मृत्युर्विश्वजिच्छकधूमं भवाशर्वावित्युपदधीत ॥१३॥ उत्तमेन सारूपवत्सस्य रुद्राय त्रिर्जुहोति ॥१४॥ उपो- त्तमेन सुहृदो ब्राह्मणस्य शकृत्पिण्डान् पर्वस्वाधाय शकधूमं किमद्याहरिति पृच्छति ॥१५॥ भद्रं सुमङ्गलमिति प्रतिपद्यते ॥१६॥ युक्तयोर्मा नो देवा यस्ते सर्प इति शयनशालोर्वराः परिलिखति ॥१७॥ तृणानि युगत- र्द्मना सम्पातवन्ति द्वारे प्रचृतति ॥१८॥ ऊबध्यं संभि- नत्ति ॥१९॥ निखनति ॥२०॥ आदधाति ॥२१॥ अपामार्ग- एक २ होता है ॥१३॥ “भवाशर्वौ मृडतम्” इस सूक्त से चरु की आहुति देवे । रुद्र, भूत, प्रेत, राक्षस, लोकपाल, गृहदेव, महादेव, गण आदि के उपहत और अभिघात में कल्याण होता है । सारूपवत्सा गौ के घृतसे रुद्रदेव के लिये ३ आहुतियाँ देवे ॥१४॥ शीघ्रता से पुण्य मङ्गल कर्म के करने में स्वस्त्ययन को कहते हैं । “भवाशर्वौ मृडतं०” इत्यादि मंत्र से सुहृत् ब्राह्मण के गौ के गोबर के पिण्डों को पर्व तिथि में आधान करके “शकधूमं किमद्याहरिति ।” पूछे । ब्राह्मण “भद्रं सुमङ्गलं” आदि ऐसा कहे ॥१५॥ जब शीघ्रता से कार्य्य करने की इच्छा हो तब यह कर्म करके शान्ति कर्म्म करे ॥१६॥ सर्प, वृश्चिक, द्विदंशक, मशक, भ्रमर, भूमि कीट और कृमियों के भय निवृत्ति के लिये । “येऽस्यां स्थ०” सूक्त, “प्राची दिग्०” सूक्त, जिस दिशा के लिये मंत्र पढ़े उसका नाम लेवे । “मा नो देवा०” सूक्त,—इन सूक्तों से बाल को अभिमंत्रण करके घर के सब ओर छिटे और शर्करा को अभिमंत्रण करके शयन पर या घर पर, उर्वरा भूमि में, या घर या बन में बिखेर देवे ॥१७॥ “येऽस्यां स्थ०” सूक्त से तृण माला को युग छिद्र से गिरा कर अभिमंत्रण करके घर के द्वार पर बाँध देवे जिसको कल्याण की इच्छा हो । महानवमी या दीपोत्सव में यह कर्म करे । हाथी के आने जाने के मार्ग में बाँधे । तृणमाला को युगच्छिद्र से गिराकर मार्ग में, पत्तन द्वार पर, घर के द्वार पर, बाँधे । सर्प, वृश्चिक, मशक, भ्रमर, कृमि के भय में इसको बाँधे ॥१८॥ “येऽस्यां स्थ०” सूक्त से सूखे गोबर को अभिमंत्रण करके घर में ॥१९॥ गोबर को अभिमंत्रण करके पत्तनद्वार पर, घर के द्वार पर,
१२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । प्रसूनानुकुद्रीचीशफान् पराचीनमूलान् ॥२२॥१॥५०॥ उदित इति खादिरं शङ्कं सम्पातवन्तमुद्बृहन्नि- खनन्गा अनुव्रजति ॥१॥ निनयनं समुह्य चारे सारूप- वत्सस्येन्द्राय त्रिर्जुहोति ॥२॥ दिश्यान् बलीन् हरति ॥३॥ प्रतिदिशमुपतिष्ठते ॥४॥ मध्ये पञ्चममनिर्दिष्टम् ॥५॥ शेषं निनयति ॥६॥ ब्रह्म जज्ञानं भवाशर्वावित्या- सन्नमरण्ये पर्वतं यजते ॥७॥ अन्यस्मिन् भवशर्वपशुप- खेत में गाड़ देवे ॥२०॥ गोबर को अग्नि में डाले ॥२१॥ चिड़चिड़ी के फूल को "येऽस्यां स्थ०" से अभिमंत्रण करके घर में बिछावे, और घर के द्वार पर गाड़ देवे । ग्राम में गाड़ देवे । गुडूची को अभिमंत्रण कर के भाँति २ का काम करे । घर में बिछावे, अभिमंत्रण कर गाड़ देवे । गुडूची के डाढ़ या जड़ को अग्नि में आहुति करे और प्राचीन मूल नामक बूटी को भी इस प्रकार व्यवहार करे ॥२२॥१॥५०॥ यह पचा- सर्वी कण्डिका समाप्त हुई ।। व्याघ्र, चोर, वृक, चरक, सिंह, आदि बन के हिंसक जन्तुओं के भय निवृत्ति के लिये स्वस्त्ययन करे । कल्याण चाहने वाला जब घर से बाहर वन आदि होकर जावे तो गौ को आगे करके उसके पीछे कीलक गाड़ता, उसको उखाड़ता जावे ॥१॥ जल के घड़े को अभिमंत्रण करके गौ के आने जाने मार्ग में लावे और पांसुकूट की क्रिया करके उसके आधे भाग को दहिने हाथ से फेके । सारूपवत्सा गौ के घृत से इन्द्रदेव के लिये आहुतियाँ देवे ॥२॥ प्रत्येक दिशा में बलियों को देवे । और "येऽस्यां स्थ०" सूक्त के प्रत्येक ऋचाओं से प्रत्येक दिशाओं का उपस्थान करे ॥३॥४॥ मध्य भाग में पांचवीं बलि देवे ॥५॥ "ब्रह्म जज्ञानं०" और "भवाशर्वौ०" से पर्वत देवता के लिये जंगल में पाकयज्ञ विधान से आज्यभाग तक करके "ब्रह्म जज्ञानमनाप्ता०" इत्यादि सूक्त से आहुति देवे । "हिमवते त्वा जुष्टं निर्वपामि०" इत्यादि आहुति करे । और निकट के पर्वत का यज्ञ करे "भवाशर्वौ मृडतं०" इस अर्ध सूक्त से चरु की आहुति देवे । "भवाय जुष्टं निर्वपामि०" इत्यादि ॥६॥७॥ भवशर्व आदि देवों के लिये पृथक् निर्वाप न करके बड़े भाण्ड में पकावे । ये सात पर्वत देवता हैं । व्याघ्र, चोर, वृश्चिक, हाथी, बन की गौ
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२९ स्युग्ररुद्रमहादेवेशानानां पृथगाहुतीः ॥८॥गोष्ठे च द्विती- यमश्नाति ॥६॥ दर्भानाधाय धूपयति ॥१०॥ भूत्यै वः पुष्ट्यैवेति प्रथमजयोर्मिंथुनयोर्मुखमनक्ति ॥११॥ तिस्रो नलदशाखा वत्सान् पाययति ॥१२॥ शाखयोदकधारया गाः परिक्रामति ॥ १३ ॥ अश्मवर्म म इति षडश्मनः सम्पातवतः स्रक्तिषु पर्यधस्तान्निखनति ॥१४॥ अलसा- लेस्यालभेषजम् ॥१५॥ त्रीणि सिलाञ्जालाग्राण्युर्धरा- मध्ये निखनति ॥१६॥ हतं तर्दमित्यपसा सोसं कर्ष- न्रुर्वरां परिक्रामति ॥१७॥ अश्मनोऽवकिरति ॥१८॥ तर्दमवशिरसं वदनाह्केशेन समुह्योर्वरामध्ये निखनति ॥१९॥ उक्तं चारे ॥२०॥ बलीन् हरत्याशाया आशा- इनके भय निवृत्ति के लिये स्वस्त्ययन हुआ ॥८॥ अब गोष्ठ कर्म को कहेंगे । गौ की शान्ती के लिये पाकयज्ञ तन्त्र को करके "इन्द्रदेवतायै०" इत्यादि सूक्त से और "भवशर्वौ मृडतं०" सूक्त से चरु की आहुति देवे और रुद्रदेव के हविका उच्छिष्ट को यजमान खावे ॥९॥ दर्भों का आधान करके धूप देवे ॥१०॥ "भूत्यै वः पुष्ट्यैवः०"। प्रथम उत्पन्न दो बच्चों के मुख को मार्जन करे । अर्थात् पहिली वार ब्यायी हुई गौ की शान्ति "ब्रह्म जज्ञानं०" इत्यादि से करे ॥११॥ नलद् की तीन शाखा को वत्सों को पिलावे ॥१२॥ शाखा की जल धारा को अभिमन्त्रण कर गौओं के लिये बाहर जल धारा को लावे ॥१३॥ पत्तन के ग्राम गृह की शान्ति को कहते हैं । घर के कोणों में ४ एक मध्य में नीचे और एक घर के ऊपर यों छः पत्थरों को "अश्मवर्म०" से डाले ॥१४॥ "अलसाल०" से गोधूम को डाले ॥१५॥ और तीन सिलांजलके अग्रभागों को उर्वरा भूमि में डाले ॥१६॥ खेत को नाश करने वाले मूषक, पतङ्ग, शलभ, हरिया, रुरु, और शल्यादि की शान्तिकर्म को कहते हैं । जिस खेत में उक्त सस्यविनाशक जन्तुओं का आक्रमण होता ही वहां "हतं तर्द०" इत्यादि से पत्थर को अभिमंत्रण करके बखेर देवे ॥१७॥१८॥ मूषक आदि के मुख को केशों से बान्ध करके सम्मुहन करके खेत में गाड़ देवे ॥१९॥ आचार ग्रन्थ में १७
१३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पतये ऽश्विभ्यां क्षेत्रपतये ॥२१॥ यद्दैतेभ्यः कुर्वीत वाग्य- तस्तिष्ठेदास्तमयात् ॥२२॥२॥५१॥ ये पन्थान इति परीह्योपदधीत ॥१॥ प्रयच्छति ॥२॥ यस्यास्ते यत्ते देवी विषाणा पाशानित्युन्मोचनप्रतिरूपं सम्पातवन्तं करोति ॥३॥ वाचा बद्धाय भूमिपरिलेखम् ॥४॥ आयन इति शमनमन्तरा हृदं करोति ॥५॥ शाले च ॥६॥ अवकया शालां परितनोति ॥७॥ शप्यमानाय प्रयच्छति ॥८॥ निदग्धं प्रक्षालयति ॥६॥ महीमू ष्विति तरणान्यालम्भयति ॥१०॥ दूरान्नावं सम्पातवतीं नौमणिं कहा है प्रत्येक दिशाओं में “आशापतयेऽश्विभ्यां क्षेत्रपतये०” इत्यादि से बलियों को देवे और उस दिन सूर्य भगवान् के अस्त समय तक मौन व्रत धारण करे ॥२०॥२१॥२२॥२॥५१॥ यह एकावनवी कण्डिका समाप्त हुई । “ये पन्थान०” से परिक्रमा करके आज्य की आहुति करे ॥१॥ मन्थ को अभिमंत्रण करके पथिकों को देवे, भात को अभिमंत्रण करके भोजन करावे । पुरुष को किसी ने बाँध दिया हो उसके मोचनार्थ शान्ति करे । “यस्यास्ते०” इस ऋचा वाले सूक्त से, जिस पदार्थ से बान्धा गया है उसके समान सम्पातवन्त करके सूक्त सदृश दूसरे सम्पातवन्त करे “विषाणापाशान्०” इस चार ऋचा से निगड़ युगल द्वयको सम्पातवन्त करके “यत्ते देवी०” इस तीन ऋचा से निगड युगल द्वय को डालकर । एक मुक्त निगड़ चमड़े वाले को या लोहमय को या जिससे बन्धा हो उसी के समान करके अभ्यातानादि उत्तर तंत्र करे ॥३॥ अब वचन से बान्धे हुए के मोचन को कहते हैं । अग्निदाव की रक्षा को कहते हैं । जल को अभिमंत्रण करके “आयन०” मंत्र से जल को गर्त में डालकर जल से भर देवे ॥५॥ और शाला में भी दोनों कर्म को करे तो आग से उसकी रक्षा होगी ॥६॥ अग्नि के उत्पात में शाला को शेवाल से घेरा करे ॥७॥ “आयन०” सूक्त से शपथ करने वाले को दिव्य को अभिमंत्रण करके (माषको) दिव्य में शुद्धि होती है ॥८॥ अङ्ग जले को जल अभिमंत्रण करके प्रक्षालन करे तो अङ्ग आरोग्य हो जाता है ॥९॥ दूर जाने में नाव से रक्षा के लिये नाव आदि को अभि-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३१ बध्नाति ॥११॥ प्रपथ इति नष्टैषिणां प्रक्षालिताभ्यक्त- पाणिपादानां दक्षिणान्पाणीन्निमृज्योत्थापयति ॥१२॥ एवं सम्पातवतः ॥१३॥ निमृज्यैकविंशतिं शर्कराश्च- तुष्पथेऽवक्षिप्यावकिरति ॥१४॥ नमस्कृत्वेति मन्त्रो- क्तम् ॥१५॥ अंहोलिङ्गानामापो भोजनहवींष्यभिमर्श- नोपस्थानमादित्यस्य ॥१६॥ स्वयं हविषां भोजनम् ॥१७॥ विश्वे देवा इत्यायुष्याणि ॥१८॥ स्थालीपाके घृतपि- ण्डान् प्रतिनीयाश्नाति ॥१९॥ अस्मिन्वसु यदाबध्नन्व प्राणानिति युग्मकृष्णलमादिष्टानां स्थालीपाक आधाय मंत्रण करके तब उसपर चढ़े। और नौमणि को बान्ध लेवे ॥१०॥ अर्थात् नौका में बैठने वालों को नौमणि को ऋचा से अभिमंत्रण करके सम्पातवती नौमणि को बांध देवे ॥११॥ नष्ट द्रव्य के मिलने को कहते हैं। “प्रपथ०” से नष्ट वस्तु पाने वाले हाथ पैर धोकर साफ करके दहिने हाथ (पाणि) को मार्जन करके उठावे और इसी प्रकार संपातवती (गिरावै) करै ॥१३॥ इक्कीश शर्करा को मार्जन करके चौराहे पर फेक कर बिखेर देवे ॥१४॥ और “द्यावापृथिवीभ्यां०” ऋचा को जप करके अर्थ सूक्त से उपस्थान करे ॥१५॥ सप्तप्रतीक का अंहोलिंगगण होता है। इसकी एक २ ऋचा से होम करे। १३ हवियों से आहुति करे ऐसा विकल्प पक्ष है। भोजन को अभिमंत्रण करके खिलावे। भक्ष को खावे। हवि, आज्य और समिधाकी आहुति करे। आप्लवनावसेचनादि यथासंभव करे। पाप संसर्ग में, व्याधि संसर्ग में, वर्ण संसर्ग में, दूसरे २ पापों में स्वस्तयन करे। अंहो लिङ्ग के विकल्प से हृदय को छू कर जप करके आदित्य का उपस्थान करे। उसी सूक्त से अभिमर्शन करे, पुरुष या अन्य का। वृक्ष, घर, स्त्री, पुरुष आदि का स्वस्तयन करे। अभिमर्शन करके आदित्य का उपस्थान करे ॥१७॥ हवि को अभिमंत्रण करके खावे। “विश्वेदेवा०” से स्वयं अभिमंत्रण करके खावे ॥१८॥ स्थालीपाक से घी के तीन पिण्डों को करके, धरकर अभिमंत्रण करके घी और स्थालीपाक को खावे । इससे आयु बढ़ेगा ॥१९॥ हिरण्यमणि को
१३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । बध्नाति ॥२०॥ आशयति ॥२१॥३॥५२॥ आयुर्दा इति गोदानं कारयिष्यन्सम्भारान् सम्भरति ॥ १ ॥ अमन्त्रिमोजोमानीँ दूर्वामकशूकमश्ममण्डलमान- डुहशकृत्पिण्डं षड् दर्भप्रान्तानि कंसमहते वसने शुद्ध- माज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥ २ ॥ बाह्यतः शान्तवृक्षस्येध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥ ३ ॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥ ४ ॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥५॥ पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्यान्वारब्धाय शान्त्युदकं करोति ॥६॥ तत्रैतत्सूक्तमनुयोजयति ॥ ७॥ त्रिरेवाग्निं सम्प्रोक्षति त्रिः पर्युक्षति ॥ ८ ॥ त्रिः कारयमाणमा- चामयति च सम्प्रोक्षति च ॥६॥ शकृत्पिण्डस्य स्थाल- रूपं कृत्वा सुहृदे ब्राह्मणाय प्रयच्छति ॥ १० ॥ तथ्सु- “अस्मिन्वसु०” इत्यादि से स्थालीपाक में डालकर बांधे । और तब भोजन करे ॥२०॥२१॥३॥५२॥ यह बावनवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ “आयुर्दा०” से, गोदान कर्म को करने की इच्छा वाला, इसकी सामग्रियों को इकट्ठा करे । यह कर्म वर्ष में करे या जैसा कुल का धर्म हो वैसा करे ॥१॥ अमन्त्रि, ओजमानी, दूर्वा, अकर्ण, अश्ममण्डल, बैल का गोबर, दर्भ के छः प्रान्त, कटोरा, अखण्ड नये वस्त्र, शुद्ध घृत, शान्ताओषधी, और जल कुम्भ को लावे ॥२॥ और बाहर शान्त वृक्ष के इध्मको पूर्वमुख घरे ॥३॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण, करके बर्हिकुश, जलपात्र को लाकर और आज्यविधि पूर्वक तैयार करके ॥४॥ नित्य पुरस्तात् होमों को करके आज्य भाग की दो आहुतियों को करके ॥५॥ अग्नि के पश्चात् भाग में पूर्वमुख बैठकर अन्वारब्ध हुआ शान्ति जल को करे ॥६॥ वहां “आयुर्दा०” सूक्त की योजना करे ॥७॥ तीन बार अग्नि संप्रोक्षण और तीन ही बार पर्युक्षण करे ॥८॥ और तीन बार करवाने बालक को आचमन एवं संप्रोक्षण करावे ॥९॥ गोबर के पिण्ड को स्थाल रूप करके सुहृत् ब्राह्मण को देवे ॥१०॥ वह ब्राह्मण सुहृत् अग्नि के
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३३ हृद्दक्षिणतोऽग्नेरुदङ्मुख आसीनो धारयति ॥ ११ ॥ अथास्मा अन्वारब्धाय करोति ॥ १२ ॥ आयुर्दा इत्यनेन सूक्तेनाज्यं जुहन्मूर्धिन सम्पातानानयति ॥ १३ ॥ दक्षिणे पाणावङ्गमण्डल उदपात्र उत्तरसम्पातान् स्थालरूप आनयति ॥१४॥ अमन्त्रि मोजोमानीयोदपात्रे- ऽवधाय ॥ १५ ॥ स्थालरूपे दूर्वां शान्त्युदकमुष्णोदकं चैकधामभिसमासिच्य ॥१६॥ आयमगन्सविता क्षुरेणेत्यु- दपात्रमनुमन्त्रयते ॥१७॥ अदितिः श्मश्रिवस्युन्दति ॥१८॥ यत्क्षुरेणेत्युदकपत्रं क्षुरमद्भिश्चोक्ष्य त्रिः प्रमाष्टि ॥ ॥१९॥ येनावपदिति दक्षिणस्य केशपक्षस्य दर्भपिञ्जूल्या केशानभिनिधाय प्रच्छिद्य स्थालरूपे करोति ॥ २० ॥ एवमेव द्वितीयं करोति ॥ २१ ॥ एवं तृतीयम् ॥ २२ ॥ एवमेवोत्तरस्य केशपक्षस्य करोति ॥२३॥४॥५३॥ अथ नापितं समादिशत्यक्ष्णन्वप केशाञ्श्मश्रुरोम दक्षिण भाग में होकर उत्तर मुख बैठकर धारण करे ॥११॥ अब इस अन्वारब्ध बालक के लिये करे ॥१२॥ दक्षिणेसे सुहृत् के उत्तर हाथ में होकर गिरा कर गोबर पिण्ड पर लावे ॥१४॥ उदपात्र में पोथिका और गुडूची को डालकर तब सम्पात को गोबर पिण्ड पर दूर्वा धरकर डाले और शान्त्युदक और गर्म जल एकत्र धारा करके आसिंचन कर “आय- मगन्सविता०” से क्षुरा से उदपात्र को अनुमंत्रण करे । और “अदितिः श्मश्रू०” से दाढ़ो मूछ के बालों को काटे । ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ ॥१७॥१८॥ “यत्क्षुरेण०” से जलपात्र को क्षुरा के जल से तीन बार मार्जन करे ॥१९॥ “येनावत्०” से शिर के दक्षिण के केशपक्ष पर दर्भपिञ्जुली द्वारा केशों पर धरकर काटकर ढेर करे ॥२०॥ इसी प्रकार उत्तरकेश पक्ष को भी करे ॥२१॥ इसी भांति तीसरे को करे । ॥२२॥ इसी प्रकार उत्तर केशपक्ष को भी करे ॥२३॥४॥५३॥ यह तिर- पनवी कण्डिका समाप्त हुई । अब नापित को आदेश करे कि बिना घाव किये केश, दाढ़ी, मौंछ,
१३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । परिवप नखानि च कुर्विति ॥१॥ पुनः प्राणः पुनर्मैत्वि- न्द्रियमिति त्रिर्निर्मृज्य ॥ २॥ त्वयि महिमानं साद- यामीत्यन्ततो योजयेत् ॥३॥ अथैनमुप्तकेशश्मश्रुं कृत्त- नखमाप्लावयति ॥ ४ ॥ हिरण्यवर्णा इत्येतेन सूक्तेन गन्धप्रवादाभिरलङ्कृत्य ॥ ५॥ स्वक्तं म इत्यानक्ति ॥ ६॥ अथैनमहतेन वसनेन परिधापयति परिधत्तेति द्वाभ्याम् ॥ ७॥ एह्यश्मानमातिष्ठेति दक्षिणेन पादे- नाश्ममण्डलमास्थाप्य प्रदक्षिणमग्निमनुपरीणीय ॥ ८ ॥ अथास्य वासो निर्मुष्णाति यस्य ते वास इत्येतया ॥९॥ अथैनमपरेणाहतेन वसनेनाच्छादयत्ययं वस्ते गर्भं पृथिव्या इति पञ्चभिः ॥ १० ॥ यथा द्यौर्मनसे चेतसे धिय इति महाव्रीहीणां स्थालीपाकं श्रपयित्वा शान्त्यु- दकेनोपसिच्याभिमन्त्र्य प्राशयति ॥ ११ ॥ प्राणापाना- रोमों को बनाओ और नखों को काटो ॥१॥ “पुनः प्राणः” इत्यादि से तीन बार मार्जन करके ॥२॥ “त्वयि महिमानं सादयामि०” इत्यादि पुनः केशों को काटने के लिये नापित को क्षुरा साफ कर देवे ॥३॥ अब इस केशादि कटवाये बालक को स्नान करावे ॥४॥ “हिरण्यवर्णा०” इत्यादि सूक्त से कलशोदक को अभिमंत्रण करके “यस्ते गन्ध” तीन ऋचा से बालक को नहवावे और गन्ध पुष्प को अभिमंत्रण कर लेवे ॥५॥ “स्वक्तं म०” से दो आँखों में अञ्जन लगावे ॥६॥ और अखण्ड नये वस्त्र को “परिधत्त” इस दो ऋचाओं से पहनावे ॥७॥ “एह्यश्मानमातिष्ठ०” इत्यादि दक्षिण पग को पत्थर पर स्थापन करे और अग्नि की प्रदक्षिणा कर ऐसा करे ॥८॥ अब इस “यस्य ते वास०” ऋचा से ओढ़ने के वस्त्र को देवे ॥९॥ अब इस बालक को दूसरे वस्त्र से ( जो नया हो ) आच्छादन करे । “अयं वस्ते गर्भं पृथिव्या०” इन पांच ऋचाओं से ॥१०॥ “यथा द्यौर्मनसे चेतसे धिय०” से महाव्रीहियों के स्थालीपाक को पका कर शान्ति जल सेचन कर अभिमंत्रण करके प्राशन करावे ॥११॥ “प्राणापानौ ओजोऽसि०” से आज्य की आहुति करे । समिध का
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३५ वोजोऽसीत्युपदधीत ॥ १२ ॥ तुभ्यमेव जरिमन्निति कुमारं मातापितरौ त्रिः सम्प्रयच्छेते ॥१३॥ घृतपिण्डा- नाशयतः ॥ १४ ॥ चूडाकरणं च गोदानेन व्याख्यातम् ॥ १५ ॥ परिधापनाश्ममण्डलवर्जम् ॥ १६ ॥ शिवे ते स्तामिति परिदानान्तानि ॥१७॥ पार्थिवस्य मा प्रगा- मेति चतस्रः सर्वाण्यपियन्ति ॥ १८ ॥ अमग्रिमोजोमा- नीं च दूर्वां च केशांश्च शकृत्पिण्डं चैकधाभिसमाहृत्य ॥ १६ ॥ शान्तवृक्षस्योपर्यादधाति ॥ २० ॥ अधिकरणं ब्रह्मणः कंसवसनं गौर्दक्षिणा ॥ २१ ॥ ब्राह्मणान्भक्तेनो- पेप्सन्ति ॥ २२ ॥ ५ ॥ ५४ ॥ उपनयनम् ॥ १ ॥ आयमगन्निति मन्त्रोक्तम् ॥ २ ॥ आधान करे, पलाश आदि की समित् “पुरोडाश, दूध, ओदन, पायस और पशु की आहुति करे ॥१२॥ “तुभ्यमेव जरिमन्०” से कुमार को माता और पिता माता परस्पर संप्रयच्छन करें । जैसे—पहिले पिता माता को, तब माता पिता को, तीसरे पिता माता को छः बार सूक्त की आवृत्ति करे । फिर इसी सूक्त से तीन घृत पिण्डों को प्रत्येक २ को डाल कर अभिमंत्रण करके कुमार को चटावे, तब पूर्वोक्त पिंडदानों को देवे ॥ १३ ॥ १४ ॥ चूडाकरण गोदान के साथ कहा गया ॥ १५ ॥ परिधापन और अश्मारोहण को छोड़कर ॥१६॥ शिवे ते स्तां०” से परिदान के अन्त तक करो ॥१७॥ “पार्थिवस्य मा प्रगां०” से ४ को करे ॥१८॥ अमग्नि, ओजोमानी, दूर्वा, केशों को, गोबर पिण्ड को एक ही बार लाकर शान्त वृक्ष के ऊपर घरे ॥१९॥२०॥ दक्षिणा में ब्राह्मण को कटोरा, कपड़ा और गौ देवे ॥२१॥ और ब्राह्मण को उनकी इच्छा- नुसार भोजन करावे ॥२२॥५॥५४॥ यह चौपनवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब उपनयन कर्म को कहेंगे । गर्भ के पाचवें या आठवें वर्ष में उपनयन संस्कार ब्राह्मण का होता है ॥१॥ “आयमगन्निति०” से दूर्वा, शान्ति जल, उष्ण जल को एक प्रकार करके अभिमंत्रण करे ॥ जलपात्र को अनुमंत्रण करे ॥२॥ छुरा को गर्म जल से मार्जन करके जल लेकर
१३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यत्क्षुरेणेत्युक्तम् ॥ ३ ॥ येनावपदिति सकृदपिञ्जूलि ॥४॥ लौकिकं च समानामा परिधानात् ॥ ५ ॥ उपेतपूर्वस्य नियतं सवान्दास्यतोऽग्नीनाधास्यमानः पर्यवेत्तव्रतदी- क्षिष्यमाणानाम् ॥६॥ सोष्णोदकं शान्त्युदकं प्रदक्षिण- मनुपरिणीय पुरस्तादग्नेः प्रत्यङ्मुखमवस्थाप्य ॥ ७ ॥ आह ब्रूहि ॥ ८ ॥ ब्रह्मचर्य्यमागमुप मा नयस्वेति ॥९॥ को नामासि किंगोत्र इत्यसाविति यथा नामगोत्रे भवतस्तथा प्रब्रूहि ॥ १० ॥ आर्षेयं मा कृत्वा बन्धु- मन्तमुपनय ॥ ११ ॥ आर्षेयं त्वा कृत्वा बन्धुमन्तमुपन- यामीति ॥ १२ ॥ ओं भूर्भुवःस्वर्जनदोमित्यञ्जलावु- दकमासिञ्चति ॥ १३ ॥ उत्तरोऽसानि ब्रह्मचारिभ्य इत्युत्तमं पाणिमन्वादधाति ॥१४॥ एष म आदित्यपुत्रस्त- न्मे गोपायस्वेत्यादित्येन समीक्षते ॥ १५ ॥ अपक्रामन् “आदित्या०” एवं “अदितिः” ऋचाओं से केशों को वपन करे ॥ “येना- वपत्” से केशों को काटे, दर्भ पिञ्जुली को छोड़ कर के ॥४॥ और लौकिक को परिधान तक तुल्य होता है ॥५॥ उपनीत पूर्व को नियत सबों को देते हुए अग्नियों का आधान करने वाला पर्यवेत्त दीक्षिष्यमाण का ठंडा गर्म मिले जल को, शान्ति जल को प्रदक्षिण अनुपरिणीय अग्नि के पूर्व भाग में पूर्व मुख बैठ करके कहें कि “कहा” ॥५॥६॥७॥८॥ “ब्रह्मचर्य- मागमुप मा नयस्व०” ॥९॥ आचार्य कहें-“तुम्हारा क्या नाम है ? क्या गोत्र है ? तब ब्रह्मचारी कहे-मेरा नाम ( जो हो राम आदिक ) अमुक गोत्र, अमुक प्रवर, अमुकशर्म्माऽहं इत्यादि ॥१०॥ ब्रह्मचारी कहे-“आर्षेयं मा कृत्वा बन्धुमन्तमुपनय ॥११॥ आचार्य्य-“आर्षेयं त्वा कृत्वा बन्धु- मन्तमुपनयामि” ॥१२॥ ओं भूर्भुवः स्वर्जनदों”, से अञ्जली में जल आसिंचन करे ॥१३॥ “उत्तरोऽसानि ब्रह्मचारिभ्य०” से आचार्य्य ब्रह्म- चारी के दहिने हाथ को पकड़ कर “एष म आदित्यपुत्रस्तन्मे गोपा- यस्व०” से आदित्य को देखे ॥१४॥१५॥ “अपक्रामन् पौरुषेयाद्
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३७ न्पौरुषेयाद्वृणान इत्येनं बाहुगृहीतं प्राञ्चमवस्थाप्य दक्षिणेन पाणिना नाभिदेशेऽभिसंस्तभ्य जपति ॥१६॥ अस्मिन् वसु वसवो धारयन्तु विश्वे देवा वसव आ यातु मित्रोऽमुत्र भूयादन्तकाय मृत्यव आरभस्व प्राणाय नमो विषासहिमित्यभिमन्त्रयते ॥१७॥ अथापि परित्वरमाण आ यातु मित्र इत्यपि खल्वेतावत्तैवोप्- नीतो भवति ॥१८॥ प्रच्छाद्य त्रीन् प्राणायामान् कृत्वा- वच्छाद्य वत्सतरीमुदपात्रे समवेक्षयेत् ॥१९॥ समिन्द्र नः संवर्चसेति द्वाभ्यामुत्सृजन्ति गाम् ॥२०॥६॥५५॥ श्रद्धाया दुहितेति द्वाभ्यां भाद्रमौञ्जीं मेखलां बध्नाति ॥१॥ मित्रावरुणयोस्त्वा हस्ताभ्यां प्रसूतः प्रशिषा प्रयच्छा- मीति पालाशं दण्डं प्रयच्छति ॥२॥ मित्रावरुणयोस्त्वा हस्ताभ्यां प्रसूतःप्रशिषा प्रतिगृह्णामि । सुश्रवः सुश्रवसं मा कुर्ववक्रोऽविथुरोऽहं भूयासमिति प्रतिगृह्णाति ॥३॥ श्येनोऽसीति च ॥ ४ ॥ अथैनं व्रतादानीयाः समिध वृणान०” से ब्रह्मचारी के बाहु को पकड़ कर पूर्व मुख धर कर अपने दहिने हाथ से ब्रह्मचारी के नाभि देश पर संस्तंभन कर जप करे “अस्मिन्वसु वसवो धारयन्तु०” इत्यादि से अभिमंत्रण करे ॥१६॥ १७॥ और भी आचार्य यदि त्वरमाण हो तो “आ यातु मित्रं०” यह भी- इससे भी बालक उपनीत होगा ॥१८॥ ब्रह्मचारी को वस्त्र से आच्छादन करके तीन प्राणायामों को करके वत्सतरी को जलपात्र में देखो ॥१९॥ “समिन्द्र नः संवर्च०” दो ऋचाओं से गौ को छोड़ देवे ॥२०॥६॥५५॥ यह, पचपनवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “श्रद्धया दुहिता०” इन दो ऋचाओं से भाद्रमौञ्जी मेखलाको ब्रह्मचारी के कमर में पहिनावे ॥ १ ॥ “मित्रावरुणयोस्त्वा०” से पलाश के दण्ड को देवे ॥ २ ॥ “मित्रावरुणयोस्त्वा०” से प्रतिग्रहण करे ॥३॥ “श्येनोऽसि०” से भी ॥४॥ अब इसको व्रतादानीय समिधों १८
१३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । आधापयति ॥५॥ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तत्समापेयं तन्मे राध्यतां तन्मे समृद्धयतां तन्मे मा व्यनशत्तेन राध्यासं तत्ते प्रब्रवीमि तदुपाकरोमि अग्नये व्रतपतये स्वाहा ॥६॥ वायो व्रतपते । सूर्य व्रतपते । चन्द्र व्रतपते। आपो व्रतपत्न्यो। देवा व्रतपतयो। वेदा व्रतपतयो। व्रतानां व्रतपतयो व्रतमचारिषं तदशकं तत्समाप्तं तन्मे राद्धं तन्मे समृद्धं तन्मे मा व्यनशत्तेन राद्धोऽस्मि तद्वः प्रब्रवीमि तदुपाकरोमि व्रतेभ्यो व्रतपतिभ्यः स्वाहेति ॥७॥ अथैनं बद्धमेखलमाहितसमित्कं सावित्रीं वाचयति ॥८॥ पच्छः प्रथमम् ॥९॥ ततोऽर्धर्चशः ॥१०॥ ततः संहिताम् ॥११॥ अथैनं प्रशास्त्यग्नेश्वासि ब्रह्मचारिन्मम चापोऽ- शान कर्म कुरुर्ध्वस्तिष्ठन्मा दिवा स्वाप्सीः समिध आधे- हि ॥१२॥ अथैनं भूतेभ्यः परिददात्यग्नये त्वा परिददामि ब्रह्मणे त्वा परिददाम्युदङ्कथाय त्वा शूल्वाणाय परि- ददामि शत्रुञ्जयाय त्वा क्षात्रायणाय परिददामि मार्त्युंजयाय त्वा मार्त्यवाय परिददाम्यघोराय त्वा परि- ददामि तक्षकाय त्वा वैशालेयाय परिददामि हाहा- हूहूभ्यां त्वा गन्धर्वाभ्यां परिददामि योगक्षेमाभ्यां त्वा परिददामि भयाय च स्वाऽभयाय च परिददामि विश्वेभ्य-
का आधान करावे ॥५॥ “अग्न व्रतपते०” इत्यादि से आहुतियाँ करे ॥६॥७॥ इस ब्रह्मचारी को जिसने मेखला पहनी, समिदाधान किया इसको सावित्री का उपदेश करे ॥८॥ पहिले पाद् २ करके कहे ॥९॥ तब आधी २ ऋचा ॥ १० ॥ फिर सबको मिलाकर ॥११॥ अब इसका आचार्य्य भलि भाँति शासन करे—तुम अग्नि का ब्रह्मचारी हो, जल से सब कर्म करो, खड़े होकर । दिन में मत सोओ, समिधाओं का आधान करो ॥११॥१२॥ अब भूतों के लिये आचार्य देवे “अग्नये त्वा परिददा- मि०” इत्यादि ॥१३॥ “स्वस्ति चरतादिहैवेति मयि रमन्तां ब्रह्मचारिणः”