कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पतये ऽश्विभ्यां क्षेत्रपतये ॥२१॥ यद्दैतेभ्यः कुर्वीत वाग्य- तस्तिष्ठेदास्तमयात् ॥२२॥२॥५१॥ ये पन्थान इति परीह्योपदधीत ॥१॥ प्रयच्छति ॥२॥ यस्यास्ते यत्ते देवी विषाणा पाशानित्युन्मोचनप्रतिरूपं सम्पातवन्तं करोति ॥३॥ वाचा बद्धाय भूमिपरिलेखम् ॥४॥ आयन इति शमनमन्तरा हृदं करोति ॥५॥ शाले च ॥६॥ अवकया शालां परितनोति ॥७॥ शप्यमानाय प्रयच्छति ॥८॥ निदग्धं प्रक्षालयति ॥६॥ महीमू ष्विति तरणान्यालम्भयति ॥१०॥ दूरान्नावं सम्पातवतीं नौमणिं कहा है प्रत्येक दिशाओं में “आशापतयेऽश्विभ्यां क्षेत्रपतये०” इत्यादि से बलियों को देवे और उस दिन सूर्य भगवान् के अस्त समय तक मौन व्रत धारण करे ॥२०॥२१॥२२॥२॥५१॥ यह एकावनवी कण्डिका समाप्त हुई । “ये पन्थान०” से परिक्रमा करके आज्य की आहुति करे ॥१॥ मन्थ को अभिमंत्रण करके पथिकों को देवे, भात को अभिमंत्रण करके भोजन करावे । पुरुष को किसी ने बाँध दिया हो उसके मोचनार्थ शान्ति करे । “यस्यास्ते०” इस ऋचा वाले सूक्त से, जिस पदार्थ से बान्धा गया है उसके समान सम्पातवन्त करके सूक्त सदृश दूसरे सम्पातवन्त करे “विषाणापाशान्०” इस चार ऋचा से निगड़ युगल द्वयको सम्पातवन्त करके “यत्ते देवी०” इस तीन ऋचा से निगड युगल द्वय को डालकर । एक मुक्त निगड़ चमड़े वाले को या लोहमय को या जिससे बन्धा हो उसी के समान करके अभ्यातानादि उत्तर तंत्र करे ॥३॥ अब वचन से बान्धे हुए के मोचन को कहते हैं । अग्निदाव की रक्षा को कहते हैं । जल को अभिमंत्रण करके “आयन०” मंत्र से जल को गर्त में डालकर जल से भर देवे ॥५॥ और शाला में भी दोनों कर्म को करे तो आग से उसकी रक्षा होगी ॥६॥ अग्नि के उत्पात में शाला को शेवाल से घेरा करे ॥७॥ “आयन०” सूक्त से शपथ करने वाले को दिव्य को अभिमंत्रण करके (माषको) दिव्य में शुद्धि होती है ॥८॥ अङ्ग जले को जल अभिमंत्रण करके प्रक्षालन करे तो अङ्ग आरोग्य हो जाता है ॥९॥ दूर जाने में नाव से रक्षा के लिये नाव आदि को अभि-