भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३१ बध्नाति ॥११॥ प्रपथ इति नष्टैषिणां प्रक्षालिताभ्यक्त- पाणिपादानां दक्षिणान्पाणीन्निमृज्योत्थापयति ॥१२॥ एवं सम्पातवतः ॥१३॥ निमृज्यैकविंशतिं शर्कराश्च- तुष्पथेऽवक्षिप्यावकिरति ॥१४॥ नमस्कृत्वेति मन्त्रो- क्तम् ॥१५॥ अंहोलिङ्गानामापो भोजनहवींष्यभिमर्श- नोपस्थानमादित्यस्य ॥१६॥ स्वयं हविषां भोजनम् ॥१७॥ विश्वे देवा इत्यायुष्याणि ॥१८॥ स्थालीपाके घृतपि- ण्डान् प्रतिनीयाश्नाति ॥१९॥ अस्मिन्वसु यदाबध्नन्व प्राणानिति युग्मकृष्णलमादिष्टानां स्थालीपाक आधाय मंत्रण करके तब उसपर चढ़े। और नौमणि को बान्ध लेवे ॥१०॥ अर्थात् नौका में बैठने वालों को नौमणि को ऋचा से अभिमंत्रण करके सम्पातवती नौमणि को बांध देवे ॥११॥ नष्ट द्रव्य के मिलने को कहते हैं। “प्रपथ०” से नष्ट वस्तु पाने वाले हाथ पैर धोकर साफ करके दहिने हाथ (पाणि) को मार्जन करके उठावे और इसी प्रकार संपातवती (गिरावै) करै ॥१३॥ इक्कीश शर्करा को मार्जन करके चौराहे पर फेक कर बिखेर देवे ॥१४॥ और “द्यावापृथिवीभ्यां०” ऋचा को जप करके अर्थ सूक्त से उपस्थान करे ॥१५॥ सप्तप्रतीक का अंहोलिंगगण होता है। इसकी एक २ ऋचा से होम करे। १३ हवियों से आहुति करे ऐसा विकल्प पक्ष है। भोजन को अभिमंत्रण करके खिलावे। भक्ष को खावे। हवि, आज्य और समिधाकी आहुति करे। आप्लवनावसेचनादि यथासंभव करे। पाप संसर्ग में, व्याधि संसर्ग में, वर्ण संसर्ग में, दूसरे २ पापों में स्वस्तयन करे। अंहो लिङ्ग के विकल्प से हृदय को छू कर जप करके आदित्य का उपस्थान करे। उसी सूक्त से अभिमर्शन करे, पुरुष या अन्य का। वृक्ष, घर, स्त्री, पुरुष आदि का स्वस्तयन करे। अभिमर्शन करके आदित्य का उपस्थान करे ॥१७॥ हवि को अभिमंत्रण करके खावे। “विश्वेदेवा०” से स्वयं अभिमंत्रण करके खावे ॥१८॥ स्थालीपाक से घी के तीन पिण्डों को करके, धरकर अभिमंत्रण करके घी और स्थालीपाक को खावे । इससे आयु बढ़ेगा ॥१९॥ हिरण्यमणि को