कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । बध्नाति ॥२०॥ आशयति ॥२१॥३॥५२॥ आयुर्दा इति गोदानं कारयिष्यन्सम्भारान् सम्भरति ॥ १ ॥ अमन्त्रिमोजोमानीँ दूर्वामकशूकमश्ममण्डलमान- डुहशकृत्पिण्डं षड् दर्भप्रान्तानि कंसमहते वसने शुद्ध- माज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥ २ ॥ बाह्यतः शान्तवृक्षस्येध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥ ३ ॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥ ४ ॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥५॥ पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्यान्वारब्धाय शान्त्युदकं करोति ॥६॥ तत्रैतत्सूक्तमनुयोजयति ॥ ७॥ त्रिरेवाग्निं सम्प्रोक्षति त्रिः पर्युक्षति ॥ ८ ॥ त्रिः कारयमाणमा- चामयति च सम्प्रोक्षति च ॥६॥ शकृत्पिण्डस्य स्थाल- रूपं कृत्वा सुहृदे ब्राह्मणाय प्रयच्छति ॥ १० ॥ तथ्सु- “अस्मिन्वसु०” इत्यादि से स्थालीपाक में डालकर बांधे । और तब भोजन करे ॥२०॥२१॥३॥५२॥ यह बावनवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ “आयुर्दा०” से, गोदान कर्म को करने की इच्छा वाला, इसकी सामग्रियों को इकट्ठा करे । यह कर्म वर्ष में करे या जैसा कुल का धर्म हो वैसा करे ॥१॥ अमन्त्रि, ओजमानी, दूर्वा, अकर्ण, अश्ममण्डल, बैल का गोबर, दर्भ के छः प्रान्त, कटोरा, अखण्ड नये वस्त्र, शुद्ध घृत, शान्ताओषधी, और जल कुम्भ को लावे ॥२॥ और बाहर शान्त वृक्ष के इध्मको पूर्वमुख घरे ॥३॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण, करके बर्हिकुश, जलपात्र को लाकर और आज्यविधि पूर्वक तैयार करके ॥४॥ नित्य पुरस्तात् होमों को करके आज्य भाग की दो आहुतियों को करके ॥५॥ अग्नि के पश्चात् भाग में पूर्वमुख बैठकर अन्वारब्ध हुआ शान्ति जल को करे ॥६॥ वहां “आयुर्दा०” सूक्त की योजना करे ॥७॥ तीन बार अग्नि संप्रोक्षण और तीन ही बार पर्युक्षण करे ॥८॥ और तीन बार करवाने बालक को आचमन एवं संप्रोक्षण करावे ॥९॥ गोबर के पिण्ड को स्थाल रूप करके सुहृत् ब्राह्मण को देवे ॥१०॥ वह ब्राह्मण सुहृत् अग्नि के