कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३३ हृद्दक्षिणतोऽग्नेरुदङ्मुख आसीनो धारयति ॥ ११ ॥ अथास्मा अन्वारब्धाय करोति ॥ १२ ॥ आयुर्दा इत्यनेन सूक्तेनाज्यं जुहन्मूर्धिन सम्पातानानयति ॥ १३ ॥ दक्षिणे पाणावङ्गमण्डल उदपात्र उत्तरसम्पातान् स्थालरूप आनयति ॥१४॥ अमन्त्रि मोजोमानीयोदपात्रे- ऽवधाय ॥ १५ ॥ स्थालरूपे दूर्वां शान्त्युदकमुष्णोदकं चैकधामभिसमासिच्य ॥१६॥ आयमगन्सविता क्षुरेणेत्यु- दपात्रमनुमन्त्रयते ॥१७॥ अदितिः श्मश्रिवस्युन्दति ॥१८॥ यत्क्षुरेणेत्युदकपत्रं क्षुरमद्भिश्चोक्ष्य त्रिः प्रमाष्टि ॥ ॥१९॥ येनावपदिति दक्षिणस्य केशपक्षस्य दर्भपिञ्जूल्या केशानभिनिधाय प्रच्छिद्य स्थालरूपे करोति ॥ २० ॥ एवमेव द्वितीयं करोति ॥ २१ ॥ एवं तृतीयम् ॥ २२ ॥ एवमेवोत्तरस्य केशपक्षस्य करोति ॥२३॥४॥५३॥ अथ नापितं समादिशत्यक्ष्णन्वप केशाञ्श्मश्रुरोम दक्षिण भाग में होकर उत्तर मुख बैठकर धारण करे ॥११॥ अब इस अन्वारब्ध बालक के लिये करे ॥१२॥ दक्षिणेसे सुहृत् के उत्तर हाथ में होकर गिरा कर गोबर पिण्ड पर लावे ॥१४॥ उदपात्र में पोथिका और गुडूची को डालकर तब सम्पात को गोबर पिण्ड पर दूर्वा धरकर डाले और शान्त्युदक और गर्म जल एकत्र धारा करके आसिंचन कर “आय- मगन्सविता०” से क्षुरा से उदपात्र को अनुमंत्रण करे । और “अदितिः श्मश्रू०” से दाढ़ो मूछ के बालों को काटे । ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ ॥१७॥१८॥ “यत्क्षुरेण०” से जलपात्र को क्षुरा के जल से तीन बार मार्जन करे ॥१९॥ “येनावत्०” से शिर के दक्षिण के केशपक्ष पर दर्भपिञ्जुली द्वारा केशों पर धरकर काटकर ढेर करे ॥२०॥ इसी प्रकार उत्तरकेश पक्ष को भी करे ॥२१॥ इसी भांति तीसरे को करे । ॥२२॥ इसी प्रकार उत्तर केशपक्ष को भी करे ॥२३॥४॥५३॥ यह तिर- पनवी कण्डिका समाप्त हुई । अब नापित को आदेश करे कि बिना घाव किये केश, दाढ़ी, मौंछ,