कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२९ स्युग्ररुद्रमहादेवेशानानां पृथगाहुतीः ॥८॥गोष्ठे च द्विती- यमश्नाति ॥६॥ दर्भानाधाय धूपयति ॥१०॥ भूत्यै वः पुष्ट्यैवेति प्रथमजयोर्मिंथुनयोर्मुखमनक्ति ॥११॥ तिस्रो नलदशाखा वत्सान् पाययति ॥१२॥ शाखयोदकधारया गाः परिक्रामति ॥ १३ ॥ अश्मवर्म म इति षडश्मनः सम्पातवतः स्रक्तिषु पर्यधस्तान्निखनति ॥१४॥ अलसा- लेस्यालभेषजम् ॥१५॥ त्रीणि सिलाञ्जालाग्राण्युर्धरा- मध्ये निखनति ॥१६॥ हतं तर्दमित्यपसा सोसं कर्ष- न्रुर्वरां परिक्रामति ॥१७॥ अश्मनोऽवकिरति ॥१८॥ तर्दमवशिरसं वदनाह्केशेन समुह्योर्वरामध्ये निखनति ॥१९॥ उक्तं चारे ॥२०॥ बलीन् हरत्याशाया आशा- इनके भय निवृत्ति के लिये स्वस्त्ययन हुआ ॥८॥ अब गोष्ठ कर्म को कहेंगे । गौ की शान्ती के लिये पाकयज्ञ तन्त्र को करके "इन्द्रदेवतायै०" इत्यादि सूक्त से और "भवशर्वौ मृडतं०" सूक्त से चरु की आहुति देवे और रुद्रदेव के हविका उच्छिष्ट को यजमान खावे ॥९॥ दर्भों का आधान करके धूप देवे ॥१०॥ "भूत्यै वः पुष्ट्यैवः०"। प्रथम उत्पन्न दो बच्चों के मुख को मार्जन करे । अर्थात् पहिली वार ब्यायी हुई गौ की शान्ति "ब्रह्म जज्ञानं०" इत्यादि से करे ॥११॥ नलद् की तीन शाखा को वत्सों को पिलावे ॥१२॥ शाखा की जल धारा को अभिमन्त्रण कर गौओं के लिये बाहर जल धारा को लावे ॥१३॥ पत्तन के ग्राम गृह की शान्ति को कहते हैं । घर के कोणों में ४ एक मध्य में नीचे और एक घर के ऊपर यों छः पत्थरों को "अश्मवर्म०" से डाले ॥१४॥ "अलसाल०" से गोधूम को डाले ॥१५॥ और तीन सिलांजलके अग्रभागों को उर्वरा भूमि में डाले ॥१६॥ खेत को नाश करने वाले मूषक, पतङ्ग, शलभ, हरिया, रुरु, और शल्यादि की शान्तिकर्म को कहते हैं । जिस खेत में उक्त सस्यविनाशक जन्तुओं का आक्रमण होता ही वहां "हतं तर्द०" इत्यादि से पत्थर को अभिमंत्रण करके बखेर देवे ॥१७॥१८॥ मूषक आदि के मुख को केशों से बान्ध करके सम्मुहन करके खेत में गाड़ देवे ॥१९॥ आचार ग्रन्थ में १७