भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 361 में से

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पृष्ठ 167

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३५ वोजोऽसीत्युपदधीत ॥ १२ ॥ तुभ्यमेव जरिमन्निति कुमारं मातापितरौ त्रिः सम्प्रयच्छेते ॥१३॥ घृतपिण्डा- नाशयतः ॥ १४ ॥ चूडाकरणं च गोदानेन व्याख्यातम् ॥ १५ ॥ परिधापनाश्ममण्डलवर्जम् ॥ १६ ॥ शिवे ते स्तामिति परिदानान्तानि ॥१७॥ पार्थिवस्य मा प्रगा- मेति चतस्रः सर्वाण्यपियन्ति ॥ १८ ॥ अमग्रिमोजोमा- नीं च दूर्वां च केशांश्च शकृत्पिण्डं चैकधाभिसमाहृत्य ॥ १६ ॥ शान्तवृक्षस्योपर्यादधाति ॥ २० ॥ अधिकरणं ब्रह्मणः कंसवसनं गौर्दक्षिणा ॥ २१ ॥ ब्राह्मणान्भक्तेनो- पेप्सन्ति ॥ २२ ॥ ५ ॥ ५४ ॥ उपनयनम् ॥ १ ॥ आयमगन्निति मन्त्रोक्तम् ॥ २ ॥ आधान करे, पलाश आदि की समित् “पुरोडाश, दूध, ओदन, पायस और पशु की आहुति करे ॥१२॥ “तुभ्यमेव जरिमन्०” से कुमार को माता और पिता माता परस्पर संप्रयच्छन करें । जैसे—पहिले पिता माता को, तब माता पिता को, तीसरे पिता माता को छः बार सूक्त की आवृत्ति करे । फिर इसी सूक्त से तीन घृत पिण्डों को प्रत्येक २ को डाल कर अभिमंत्रण करके कुमार को चटावे, तब पूर्वोक्त पिंडदानों को देवे ॥ १३ ॥ १४ ॥ चूडाकरण गोदान के साथ कहा गया ॥ १५ ॥ परिधापन और अश्मारोहण को छोड़कर ॥१६॥ शिवे ते स्तां०” से परिदान के अन्त तक करो ॥१७॥ “पार्थिवस्य मा प्रगां०” से ४ को करे ॥१८॥ अमग्नि, ओजोमानी, दूर्वा, केशों को, गोबर पिण्ड को एक ही बार लाकर शान्त वृक्ष के ऊपर घरे ॥१९॥२०॥ दक्षिणा में ब्राह्मण को कटोरा, कपड़ा और गौ देवे ॥२१॥ और ब्राह्मण को उनकी इच्छा- नुसार भोजन करावे ॥२२॥५॥५४॥ यह चौपनवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब उपनयन कर्म को कहेंगे । गर्भ के पाचवें या आठवें वर्ष में उपनयन संस्कार ब्राह्मण का होता है ॥१॥ “आयमगन्निति०” से दूर्वा, शान्ति जल, उष्ण जल को एक प्रकार करके अभिमंत्रण करे ॥ जलपात्र को अनुमंत्रण करे ॥२॥ छुरा को गर्म जल से मार्जन करके जल लेकर

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