भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 361 में से

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पृष्ठ 168

१३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यत्क्षुरेणेत्युक्तम् ॥ ३ ॥ येनावपदिति सकृदपिञ्जूलि ॥४॥ लौकिकं च समानामा परिधानात् ॥ ५ ॥ उपेतपूर्वस्य नियतं सवान्दास्यतोऽग्नीनाधास्यमानः पर्यवेत्तव्रतदी- क्षिष्यमाणानाम् ॥६॥ सोष्णोदकं शान्त्युदकं प्रदक्षिण- मनुपरिणीय पुरस्तादग्नेः प्रत्यङ्मुखमवस्थाप्य ॥ ७ ॥ आह ब्रूहि ॥ ८ ॥ ब्रह्मचर्य्यमागमुप मा नयस्वेति ॥९॥ को नामासि किंगोत्र इत्यसाविति यथा नामगोत्रे भवतस्तथा प्रब्रूहि ॥ १० ॥ आर्षेयं मा कृत्वा बन्धु- मन्तमुपनय ॥ ११ ॥ आर्षेयं त्वा कृत्वा बन्धुमन्तमुपन- यामीति ॥ १२ ॥ ओं भूर्भुवःस्वर्जनदोमित्यञ्जलावु- दकमासिञ्चति ॥ १३ ॥ उत्तरोऽसानि ब्रह्मचारिभ्य इत्युत्तमं पाणिमन्वादधाति ॥१४॥ एष म आदित्यपुत्रस्त- न्मे गोपायस्वेत्यादित्येन समीक्षते ॥ १५ ॥ अपक्रामन् “आदित्या०” एवं “अदितिः” ऋचाओं से केशों को वपन करे ॥ “येना- वपत्” से केशों को काटे, दर्भ पिञ्जुली को छोड़ कर के ॥४॥ और लौकिक को परिधान तक तुल्य होता है ॥५॥ उपनीत पूर्व को नियत सबों को देते हुए अग्नियों का आधान करने वाला पर्यवेत्त दीक्षिष्यमाण का ठंडा गर्म मिले जल को, शान्ति जल को प्रदक्षिण अनुपरिणीय अग्नि के पूर्व भाग में पूर्व मुख बैठ करके कहें कि “कहा” ॥५॥६॥७॥८॥ “ब्रह्मचर्य- मागमुप मा नयस्व०” ॥९॥ आचार्य कहें-“तुम्हारा क्या नाम है ? क्या गोत्र है ? तब ब्रह्मचारी कहे-मेरा नाम ( जो हो राम आदिक ) अमुक गोत्र, अमुक प्रवर, अमुकशर्म्माऽहं इत्यादि ॥१०॥ ब्रह्मचारी कहे-“आर्षेयं मा कृत्वा बन्धुमन्तमुपनय ॥११॥ आचार्य्य-“आर्षेयं त्वा कृत्वा बन्धु- मन्तमुपनयामि” ॥१२॥ ओं भूर्भुवः स्वर्जनदों”, से अञ्जली में जल आसिंचन करे ॥१३॥ “उत्तरोऽसानि ब्रह्मचारिभ्य०” से आचार्य्य ब्रह्म- चारी के दहिने हाथ को पकड़ कर “एष म आदित्यपुत्रस्तन्मे गोपा- यस्व०” से आदित्य को देखे ॥१४॥१५॥ “अपक्रामन् पौरुषेयाद्

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