भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३७ न्पौरुषेयाद्वृणान इत्येनं बाहुगृहीतं प्राञ्चमवस्थाप्य दक्षिणेन पाणिना नाभिदेशेऽभिसंस्तभ्य जपति ॥१६॥ अस्मिन् वसु वसवो धारयन्तु विश्वे देवा वसव आ यातु मित्रोऽमुत्र भूयादन्तकाय मृत्यव आरभस्व प्राणाय नमो विषासहिमित्यभिमन्त्रयते ॥१७॥ अथापि परित्वरमाण आ यातु मित्र इत्यपि खल्वेतावत्तैवोप्- नीतो भवति ॥१८॥ प्रच्छाद्य त्रीन् प्राणायामान् कृत्वा- वच्छाद्य वत्सतरीमुदपात्रे समवेक्षयेत् ॥१९॥ समिन्द्र नः संवर्चसेति द्वाभ्यामुत्सृजन्ति गाम् ॥२०॥६॥५५॥ श्रद्धाया दुहितेति द्वाभ्यां भाद्रमौञ्जीं मेखलां बध्नाति ॥१॥ मित्रावरुणयोस्त्वा हस्ताभ्यां प्रसूतः प्रशिषा प्रयच्छा- मीति पालाशं दण्डं प्रयच्छति ॥२॥ मित्रावरुणयोस्त्वा हस्ताभ्यां प्रसूतःप्रशिषा प्रतिगृह्णामि । सुश्रवः सुश्रवसं मा कुर्ववक्रोऽविथुरोऽहं भूयासमिति प्रतिगृह्णाति ॥३॥ श्येनोऽसीति च ॥ ४ ॥ अथैनं व्रतादानीयाः समिध वृणान०” से ब्रह्मचारी के बाहु को पकड़ कर पूर्व मुख धर कर अपने दहिने हाथ से ब्रह्मचारी के नाभि देश पर संस्तंभन कर जप करे “अस्मिन्वसु वसवो धारयन्तु०” इत्यादि से अभिमंत्रण करे ॥१६॥ १७॥ और भी आचार्य यदि त्वरमाण हो तो “आ यातु मित्रं०” यह भी- इससे भी बालक उपनीत होगा ॥१८॥ ब्रह्मचारी को वस्त्र से आच्छादन करके तीन प्राणायामों को करके वत्सतरी को जलपात्र में देखो ॥१९॥ “समिन्द्र नः संवर्च०” दो ऋचाओं से गौ को छोड़ देवे ॥२०॥६॥५५॥ यह, पचपनवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “श्रद्धया दुहिता०” इन दो ऋचाओं से भाद्रमौञ्जी मेखलाको ब्रह्मचारी के कमर में पहिनावे ॥ १ ॥ “मित्रावरुणयोस्त्वा०” से पलाश के दण्ड को देवे ॥ २ ॥ “मित्रावरुणयोस्त्वा०” से प्रतिग्रहण करे ॥३॥ “श्येनोऽसि०” से भी ॥४॥ अब इसको व्रतादानीय समिधों १८