कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
DevanagariHindipublished361 पृष्ठ
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१३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । आधापयति ॥५॥ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तत्समापेयं तन्मे राध्यतां तन्मे समृद्धयतां तन्मे मा व्यनशत्तेन राध्यासं तत्ते प्रब्रवीमि तदुपाकरोमि अग्नये व्रतपतये स्वाहा ॥६॥ वायो व्रतपते । सूर्य व्रतपते । चन्द्र व्रतपते। आपो व्रतपत्न्यो। देवा व्रतपतयो। वेदा व्रतपतयो। व्रतानां व्रतपतयो व्रतमचारिषं तदशकं तत्समाप्तं तन्मे राद्धं तन्मे समृद्धं तन्मे मा व्यनशत्तेन राद्धोऽस्मि तद्वः प्रब्रवीमि तदुपाकरोमि व्रतेभ्यो व्रतपतिभ्यः स्वाहेति ॥७॥ अथैनं बद्धमेखलमाहितसमित्कं सावित्रीं वाचयति ॥८॥ पच्छः प्रथमम् ॥९॥ ततोऽर्धर्चशः ॥१०॥ ततः संहिताम् ॥११॥ अथैनं प्रशास्त्यग्नेश्वासि ब्रह्मचारिन्मम चापोऽ- शान कर्म कुरुर्ध्वस्तिष्ठन्मा दिवा स्वाप्सीः समिध आधे- हि ॥१२॥ अथैनं भूतेभ्यः परिददात्यग्नये त्वा परिददामि ब्रह्मणे त्वा परिददाम्युदङ्कथाय त्वा शूल्वाणाय परि- ददामि शत्रुञ्जयाय त्वा क्षात्रायणाय परिददामि मार्त्युंजयाय त्वा मार्त्यवाय परिददाम्यघोराय त्वा परि- ददामि तक्षकाय त्वा वैशालेयाय परिददामि हाहा- हूहूभ्यां त्वा गन्धर्वाभ्यां परिददामि योगक्षेमाभ्यां त्वा परिददामि भयाय च स्वाऽभयाय च परिददामि विश्वेभ्य-
का आधान करावे ॥५॥ “अग्न व्रतपते०” इत्यादि से आहुतियाँ करे ॥६॥७॥ इस ब्रह्मचारी को जिसने मेखला पहनी, समिदाधान किया इसको सावित्री का उपदेश करे ॥८॥ पहिले पाद् २ करके कहे ॥९॥ तब आधी २ ऋचा ॥ १० ॥ फिर सबको मिलाकर ॥११॥ अब इसका आचार्य्य भलि भाँति शासन करे—तुम अग्नि का ब्रह्मचारी हो, जल से सब कर्म करो, खड़े होकर । दिन में मत सोओ, समिधाओं का आधान करो ॥११॥१२॥ अब भूतों के लिये आचार्य देवे “अग्नये त्वा परिददा- मि०” इत्यादि ॥१३॥ “स्वस्ति चरतादिहैवेति मयि रमन्तां ब्रह्मचारिणः”