भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 361 में से

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पृष्ठ 171

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३९ स्त्वा देवेभ्यः परिददामि सर्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि विश्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिददामि सर्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिददामि सप्रजापतिकेभ्यः ॥१३॥ स्वस्ति चरतादिहेति मयि रमन्तां ब्रह्मचारिण इत्यनुगृह्णीयात् ॥ १४ ॥ नानु- प्रणुदेत् ॥ १५ ॥ प्रणीतोरभ्यावर्तस्वेत्यभ्यात्ममावर्तयति ॥१६॥ यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवा मा ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वदा ॥ स्वाहेत्याचार्यः समिधमादधाति ॥१७॥७॥५६॥ श्रद्धाया दुहितेति द्वाभ्यां भाद्रमौञ्जीं मेखलां ब्रा- ह्मणाय बध्नाति ॥१॥ मौर्वी क्षत्रियाय धनुर्ज्यां वा ॥२॥ क्षौमिकीं वैश्याय ॥ ३ ॥ मित्रावरुणयोस्त्वा हस्ताभ्यां प्रसूतः प्रशिषा प्रयच्छामीति पालाशं दण्डं ब्राह्मणाय प्रयच्छति ॥४॥ आश्वत्थं क्षत्रियाय ॥५॥ न्यग्रोधावरोहं वैश्याय ॥६॥ यद्यस्य दण्डो भज्येत य ऋते चिदभिश्रिष इत्येत्यालभ्याभिमन्त्रयते ॥७॥ सर्वत्र शीर्णे भिन्ने नष्टे- ऽन्यं कृत्वा पुनर्मैत्विन्द्रियमित्यादधीत ॥ ८ ॥ अथ कह कर अनुग्रह करे ॥१४॥ आचार्य ब्रह्मचारी को कहे "मेरे सम्मुख होवो" ब्रह्मचारी आचार्य के सम्मुख होवे ॥१५॥१६॥ "यथापः प्रवता०" इत्यादि से आचार्य समिधाओं को आहुति करे ॥१७॥७॥५६॥ यह छप्प- नवीं कण्डिका समाप्त हुई ।। "श्रद्धया दुहिता०" से भाद्रमौंजी मेखला को ब्राह्मण को पहनावे ॥१॥ मौर्वी मेखला या तांतकी क्षत्रिय को ॥२॥ रेशम की मेखला वैश्य को ॥३॥ "मित्रावरुणयोस्त्वा०" इत्यादि से पलाश का दण्ड ब्राह्मण को, अश्वत्थ का दण्ड क्षत्रिय को, न्यग्रोधावरोह वैश्य को देवे ॥४॥५॥६॥ यदि ब्रह्मचारी का दण्ड टूट जावे तो "य ऋते चिदभिश्रिषः०" इत्यादि ऋचा से छूकर अभिमंत्रण करे ॥७॥ सबही जगह टूटने, टुकड़े २ हो जाने, खो जाने की दशा में दूसरे दण्ड को बनाकर "पुनर्मैत्विन्द्रियं०" से आधान करे ॥८॥ ब्रह्मचारी के वस्त्रों के विषय में कहते हैं ॥९॥

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