भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

१४० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । वासांसि ॥६॥ ऐणेयहारिणानि ब्राह्मणस्य ॥ १० ॥ रौरव- पार्षतानि क्षत्रियस्य ॥ ११ ॥ आजाविकानि वैश्यस्य ॥१२॥ सर्वेषां क्षौमशाणकम्बलवस्त्रम् ॥१३॥ काषा- याणि ॥१४॥ वस्त्रं चाप्यकाषायम् ॥१५॥ भवति भिक्षां देहीति ब्राह्मणश्चरेत् ॥ १६ ॥ भिक्षां भवती ददात्विति क्षत्रियः ॥१७॥ देहि भिक्षां भवतीति वैश्यः ॥१८॥ सप्त कुलानि ब्राह्मणश्चरेत्त्रीणी क्षत्रियो द्वे वैश्यः ॥१६॥ सर्वं ग्रामं चरेद्भैक्षं स्तेनपतितवर्जम् ॥ २० ॥ मय्यग्र इति पञ्च प्रश्नेन जुहोति ॥२१॥ सं मा सिञ्चन्त्विति त्रिः पर्य्- क्षति ॥२२॥ यदग्ने तपसा तपोऽग्ने तपस्तप्यामह इतिँ द्वाभ्यां परिसमूहयति ॥ २३ ॥ इदमपः प्रवहतेति पाणी प्रक्षालयते ॥२४॥ सं मा सिञ्चन्त्विति त्रिः पर्युक्षति ॥२५॥ अग्ने समिधमाहार्षमित्यादधाति चतस्रः ॥२६॥ एधोऽ- सीत्यूष्मभक्षं भक्षयत्या निंधनात् ॥ २७ ॥ त्वं नो मेध ऐणेय हरिण का चर्म ब्राह्मण के लिये, रुरुमृग का चर्म क्षत्रिय के लिये, बकरे और भेड़ का चर्म वैश्य के लिये जानो ॥१०॥११॥१२॥ सबही वर्णों के लिये रेशमी, शण का, और कम्बल का वस्त्र बनावे ॥१३॥ काषाय रंग के वस्त्र हों ॥ वस्त्र भी काषाय रंग का न हो ॥१४॥१५॥ आप भिक्षा देवें-ऐसा कह कर ब्रा० ब्र० मांगे, “भिक्षां भवती ददातु-” ऐसा कहकर क्ष० मांगे और “देहि भिक्षां भवति”-ऐसा कह कर वैश्य मांगे ॥१६॥१७॥१८॥ सात घरों से ब्राह्मण, तीन घर से क्षत्रिय और दो घरों से वैश्य भिक्षा मांगे ॥ १९ ॥ सबही घरों से (ग्राम भर) भिक्षा मांगे, चोर एवं पतित को छोड़ कर ॥ २० ॥ “मय्यग्र०” से पञ्च प्रश्न से आहुति करे ॥२१॥ “सं मा सिञ्चन्तु०” से तीनवार पर्युक्षण करे ॥२२॥ “यदग्ने तपसा०” इत्यादि दो ऋचाओं से परिसमूहन करे ॥२३॥ “इदमपः प्रवह०” से दोनों हाथों को धोवे ॥२४॥ “सं मा सिञ्चन्तु०” से तीन वार पर्युक्षण करे ॥२५॥ “अग्ने समिधमाहार्ष०” से चार समि- धाओं को आधान करें ॥२६॥ “एधोऽसि०” से ऊष्मभक्षण (धूमभक्षण)