भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १४१ इत्युपतिष्ठते ॥२८॥ यदन्नमिति तिसृभिर्भैक्षस्य जुहोति ॥२९॥ अहरहः समिध आहृत्यैवं सायंप्रातरभ्यादध्यात् ॥३०॥ मेधाजनन आयुष्यैर्जुहुयात् ॥३१॥ यथाकामं द्वादशरात्रमरसाशी भवति ॥३२॥८॥५७॥ भद्राय कर्णः क्रोशतु भद्रायाक्षि वि वेपताम् ॥ परा दुःष्वप्न्यं सुव यद्भद्रं तन्न आ सुव ॥ अक्षिवेपं दुःष्व- प्न्यमार्त्तिं पुरुषरेषिणीम् ॥ तदस्मदश्विना युवमप्रिये प्रतिमुञ्चतम् ॥ यत्पार्श्वादुरसो मे अङ्गादङ्गादववेपते ॥ अश्विना पुष्करस्रजा तस्मान्नः पातमंहस इति कर्णं क्रो- शन्तमनुमन्त्रयते ॥१॥ अक्षि वा स्फुरत् ॥२॥ वि देवा जरसोत देवा आवतस्त उप प्रियमन्तकाय मृत्यव आ रभस्व प्राणाय नमो विषासहिमित्यभिमन्त्रयते ॥३॥ करे निधान से ॥२७॥ “त्वं नो मेध०” से उपस्थान करे ॥ २८ ॥ “यदन्नं०” इन तीन ऋचाओं से भिक्षाकी आहुतियां करे ॥ २९ ॥ प्रति दिन समि- धाओं को ला २ कर सायं प्रातः काल आधान करे ॥ ३० ॥ मेधाजनन और आयुष्यगण सूक्तों से आहुतियां करे ॥३१॥ यथाकाम १२ रात रस न खावे ॥३२॥८॥५७॥ यह सत्तावनवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “भद्राय कर्णः क्रोशतु०” इत्यादि से खुजलाते कान को अभिमंत्रण करे। आँख के फड़कने में, बुरे स्वप्न देखने पर, अनिष्ट देखने पर, और अद्भुत देखने पर अभिमंत्रण करे ॥१॥२॥ “वि देवा जरसोत०” इत्यादि से पुरुष शरीर को अभिमंत्रण करे आयुष्कामना वाले ॥३॥ ब्राह्मणोक्त और ऋषिहस्त- जिन में ब्राह्मणों को कहते हैं । सात ब्रा- ह्मणों को अभीष्ट भोजन करा कर एक को पूर्व मुख, एक को दक्षिण मुख, चार को उत्तर मुख, “सर्वे उत देवाः” इस सूक्त से पुरुष शरीर को अभिमर्शन करे ॥ अब ऋषिहस्त को कहते हैं। “अन्तकाय मृत्यवे०” सूक्त से नाभि के ऊपर और नीचे अभिमंत्रण करे । सूक्त को दो बार जप करे । “आ रभस्व०” से हृदय को अभिमंत्रण करे । “आवतस्ते