कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ब्राह्मणोक्तमृषिहस्तञ्च ॥ ४ ॥ कर्मणे वां वेषाय वां सुकृ- ताय वामिति पाणी प्रक्षाल्य ॥ ५ ॥ निर्दुरर्मण्य इति संधान्य ॥६॥ शुद्धा न आप इति निष्ठीव्य जीवाभिरा- चम्य ॥ ७॥ एहि जीवमित्याञ्जनमणिं बध्नाति ॥ ८ ॥ वाताज्जात इति कृशनम् ॥६॥ नव प्राणानिति मन्त्रोक्तम् ॥१०॥ घृतादुल्लसमा त्वा घृतस्त्वृतुमिष्टा मुञ्चामि त्वोत देवा आवतस्त उप प्रियमन्तकाय मृत्यव आरभस्व प्राणाय नमो विषासहिमित्यभिमन्त्रयते ॥११॥ निर्दुरर्म- ण्य इति सर्वसुरभिचूर्णैररण्येऽप्रतीहारं प्रलिम्पति ॥१२॥ अथ नामकरणम् ॥१३॥ आ रभस्वेमामित्यवि- च्छिन्नामुदकधारामलम्भयति ॥१४॥ पूतुदारुं बध्नाति ॥१५॥ पाययति ॥१६॥ यत्ते वास इत्यहतेनोत्तरसिचा ब्राह्मणाय नमः०” इन दो सूक्तों से दहिने कान को अनुमंत्रण करे ॥४॥ “कर्मणे वां वेषाय वां सुकृताय वां०” से दोनों हाथों को प्रक्षालन करे ॥ और “वि देवा०” सूक्त से अभिमंत्रण करे ॥ ५ ॥ “निर्दुरर्मण्य०” से जोड़ कर ॥६॥ “शुद्धा न आपः” से थूक करके “जीवा स्थ०” इन चार ऋचाओं से आचमन करके “एहि जीवं०” से आञ्जन मणि को बान्धे ॥७॥ आयुष्यकाम युद्ध में रक्षा के लिये इस का नाश नहीं होता है । न शपथ करने से और न जादू टोना से नाश होता है ॥८॥ “वाताज्जात०” से कृशन करे अर्थात् आयुष्यकाम रक्षार्थी उपनयनमें नित्य बान्धे ॥ ९ ॥ “नव प्राणान्०” सूक्त से सोना, चाँदी, लोहा, इन तीनों चूर्ण को इकट्ठा करके नव शलाक मणि को त्रिवृत बना कर धर कर अभिमंत्रण करके बान्धे ॥ १० ॥ “घृतादुल्लप्तमा त्वा०” इत्यादि से आयुष्यकाम, आरोग्य काम, रक्षा काम, वाला शरीर को अभिमंत्रण करे ॥११॥ “निर्दुरर्मण्य०” से सर्व सुरभि चूर्णों से वन में अप्रतीहार लीपे यह विकल के लिये कर्म है ॥१२॥ अब नामकरण को कहते हैं ॥१३॥ “आ रभस्वेमां” इस अर्धसूक्त से कुमार के दहिने हाथ पर जल की धारा को छावे ॥१४॥ और देवदारु मणि धर करके अभिमंत्रण कर