भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १४३ प्रच्छादयति ॥१७॥ शिवे ते स्तामिति कुमारं प्रथमं निर्ण- यति ॥१८॥ शिवौ ते स्तामिति व्रीहियवौ प्राशयति ॥१९॥ अह्ने च स्वेत्यहोरात्राभ्यां परिददाति ॥२०॥ घीस कर उसे बान्धे ॥१५॥ और उस जल को पिलावे तब पुण्याहवाचन के अन्त में नामकरण करे । २ या ४ अक्षरों का मन्थ संयुक्त या देवता संयुक्त नाम धरे । पिता कुमार के दहिने कान में सोना धर कर उस का नाम कहे ॥१६॥ “यत्ते वास०” से यंत्र निर्मुक्त वस्त्र से उत्तर किनारे से आच्छादन करके चार परिदानों को “शिवे ते स्तां०” इन दो ऋचाओं से और “हृदे ते०” तथा “पार्थिवस्य” इन दो से “मा प्रगाम०” इन दो से और व्रीहि, जौ, शमी प्रान्त, और जल को “द्यावापृथिवीभ्यां त्वा परिददामि०” से देवे ॥१७॥ पुनः कुमार के मूर्धा पर “शिवौ ते स्तां०” इन दो ऋ० से, “पार्थिवस्य०” इन दो से, “मा प्रगाम०” दो से, “व्रीहि यवाभ्यां त्वा परिददामि” “अन्हे च त्वा०” इस एक से, “पार्थिवस्य०” दो से “मा प्रगाम०” दो से, “अहोरात्राभ्यां त्वा परि- ददामि शरद०” इस एक से, “पार्थिवस्य०” दोसे, व्रीहि, जौ, शमी के पत्ते और जलको प्राशन करावे । “ऋतुभ्यस्त्वा परिददामि०” से बालक के मूर्धा में देवे और अभ्यातानादि उत्तरतन्त्र को करे । यह नामकरण संस्कार समाप्त हुआ ॥१७॥ अब चौथे मास में निष्क्रमण संस्कार करो “शिवे ते स्तां०” दो ऋचाओं से कुमार को घर से “बाहर निकाले । “उद्वयं तमसस्परि०” एक से सूर्य को दिखलावे और को पूर्वोक्त चार परिदानों को देवे और अभ्यातानादि उत्तरतंत्र की आहुतियां देवे ॥ निष्क्रमण समाप्त हुआ ॥१८॥ अब छठे मास में कुमार का अन्न प्राशन करे ॥ “अन्यचसञ्च” इत्यादि अभ्यातानान्त कर्म करके “भूमे मात क०” इस एक से कुमार को भूमि पर बैठावे । “शिवौ ते स्तां०” से व्रीहि और जौ को अभिमंत्रण करके उसे घस कर कुमार को पिलावे ॥ और सब अन्नों को पूरा करे, स्रुक्, स्रुवा, पुस्तक, द्रव्य इनको देवे और पूर्वोक्त चारो परिदानों को यथाविधि देवे ॥ “स्वस्ति न इन्द्र०” से कुमार को अन्न प्राशन कराकर अभ्याता- नादि उत्तरतंत्र को करे ॥ यह अन्नप्राशन कर्म समाप्त हुआ ॥१९॥ “अन्हे च त्वा०” से दिन रात्रों को देवे, “शरदे त्वा०” से ऋतुओं को