भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२७ मृत्युर्विश्वजिच्छकधूमं भवाशर्वावित्युपदधीत ॥१३॥ उत्तमेन सारूपवत्सस्य रुद्राय त्रिर्जुहोति ॥१४॥ उपो- त्तमेन सुहृदो ब्राह्मणस्य शकृत्पिण्डान् पर्वस्वाधाय शकधूमं किमद्याहरिति पृच्छति ॥१५॥ भद्रं सुमङ्गलमिति प्रतिपद्यते ॥१६॥ युक्तयोर्मा नो देवा यस्ते सर्प इति शयनशालोर्वराः परिलिखति ॥१७॥ तृणानि युगत- र्द्मना सम्पातवन्ति द्वारे प्रचृतति ॥१८॥ ऊबध्यं संभि- नत्ति ॥१९॥ निखनति ॥२०॥ आदधाति ॥२१॥ अपामार्ग- एक २ होता है ॥१३॥ “भवाशर्वौ मृडतम्” इस सूक्त से चरु की आहुति देवे । रुद्र, भूत, प्रेत, राक्षस, लोकपाल, गृहदेव, महादेव, गण आदि के उपहत और अभिघात में कल्याण होता है । सारूपवत्सा गौ के घृतसे रुद्रदेव के लिये ३ आहुतियाँ देवे ॥१४॥ शीघ्रता से पुण्य मङ्गल कर्म के करने में स्वस्त्ययन को कहते हैं । “भवाशर्वौ मृडतं०” इत्यादि मंत्र से सुहृत् ब्राह्मण के गौ के गोबर के पिण्डों को पर्व तिथि में आधान करके “शकधूमं किमद्याहरिति ।” पूछे । ब्राह्मण “भद्रं सुमङ्गलं” आदि ऐसा कहे ॥१५॥ जब शीघ्रता से कार्य्य करने की इच्छा हो तब यह कर्म करके शान्ति कर्म्म करे ॥१६॥ सर्प, वृश्चिक, द्विदंशक, मशक, भ्रमर, भूमि कीट और कृमियों के भय निवृत्ति के लिये । “येऽस्यां स्थ०” सूक्त, “प्राची दिग्०” सूक्त, जिस दिशा के लिये मंत्र पढ़े उसका नाम लेवे । “मा नो देवा०” सूक्त,—इन सूक्तों से बाल को अभिमंत्रण करके घर के सब ओर छिटे और शर्करा को अभिमंत्रण करके शयन पर या घर पर, उर्वरा भूमि में, या घर या बन में बिखेर देवे ॥१७॥ “येऽस्यां स्थ०” सूक्त से तृण माला को युग छिद्र से गिरा कर अभिमंत्रण करके घर के द्वार पर बाँध देवे जिसको कल्याण की इच्छा हो । महानवमी या दीपोत्सव में यह कर्म करे । हाथी के आने जाने के मार्ग में बाँधे । तृणमाला को युगच्छिद्र से गिराकर मार्ग में, पत्तन द्वार पर, घर के द्वार पर, बाँधे । सर्प, वृश्चिक, मशक, भ्रमर, कृमि के भय में इसको बाँधे ॥१८॥ “येऽस्यां स्थ०” सूक्त से सूखे गोबर को अभिमंत्रण करके घर में ॥१९॥ गोबर को अभिमंत्रण करके पत्तनद्वार पर, घर के द्वार पर,