कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १४५ पदानामप्ययः ॥८॥ यशसं मेन्द्र इति यशस्कामः ॥९॥ मह्यमाप इति वर्चस्कामः ॥१०॥ आगच्छत इति जाया- कामः ॥११॥ वृषेन्द्रस्येति वृषकामः ॥१२॥ आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौरिति ध्रौव्यकामः ॥१३॥ त्यमू षु त्रातारमा मन्द्रैरिति स्वस्त्ययनकामः ॥१४॥ सामास्त्वाग्नेऽभ्यर्चते- स्यग्निं संपत्कामः ॥१५॥ पृथिव्यामिति मन्त्रोक्तम् ॥१६॥ तद्दिदास धीती वेतीन्द्राग्नी ॥१७॥ यस्येदमा रजोऽथर्वाण- मदितिद्यौरितेः पुत्राणां बृहस्पते सवितरित्यभ्युदितं आधान करे और घृत धरके आस्तरणों की आहुति करे ॥८॥ यश की कामना वाला “यशसं मेन्द्र०” से चरुकी आहुति करे । और “मृश- मिन्द्रं०” से उपस्थान करे ॥ ९ ॥ कूप, तड़ाग, वापी, पुष्करिणी, जल- सेतु बान्धने आदि कामना वाला “मह्यमापः” से इन्द्र के लिये आहु- तियाँ देवे एवं उपस्थान करे ॥ १० ॥ “आगच्छत०” से इन्द्र की आहुति और उपस्थान करे सन्तान की इच्छावाला ॥११॥ बैल की कामनावाला इन्द्र की आहुति और उपस्थान “वृषेन्द्रस्य०” से करे ॥१२॥ सार्वभौमराजा होने की इच्छा से “आ त्वा हार्षं ध्रुवा द्यौः” से इन्द्र की आहुति और उपस्थान करे ॥१३॥ दो पैर एवं चार पैर वाले मनुष्य एवं पशु के कल्याण की इच्छा से “त्यमू षु त्रातारमा मन्द्रैः०” । से इन्द्र की आहुति एवं उपस्थान करे ॥१४॥ सम्पत् चाहनेवाला “सामा- स्त्वाग्नेऽभ्यर्चत०” से अग्नि की आहुति और उपस्थान करे ॥१५॥ पृथ्वी, अग्नि, अन्तरिक्ष, वायु, द्यौ, आदित्य, दिशायें, चन्द्रमा ये आठ देवता, हैं । इनकी आहुतियों के लिये आठ अलग २ चरु पकाकर “पृथिव्यां०” से आहुतियां करे और उपस्थान करे । सब कामनावाला ॥१६॥ “तद्दि- दास धीती वेतीन्द्राग्नी०” से इन्द्र एवं अग्नि की आहुति एवं उपस्थान करे सर्व कामना वाला ॥१७॥ इन्द्र, अथर्वा, अदिति, देवताओं को बृह- स्पति को “यस्येदमा रजो०” इत्यादि से आहुतियां करे और उपस्थान करे सब कामनावाला ॥ और “बृहस्पते सवितः” । इस एक ऋचा से सूर्योदय होने पर सोते हुए ब्रह्मचारी को जगाकर उठा देवे । सूर्योदय १९