भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

१४६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

ब्रह्मचारिणं बोधयति ॥१८॥ धाता दधातु प्रजापतिर्ज- नयत्यन्वद्य नो यन्न इन्द्रो ययोरोजसा विष्णोर्नु कम्- आविष्णू सोमारुद्रा सिनीवालि बृहस्पतिर्नो यत्ते देवा अकृण्वन्पूर्णा पश्चात् प्रजापतेऽभ्यर्चत को अस्या न इति प्रजापतिम् ॥१९॥ अग्न इन्द्रश्चेति मन्त्रोक्तान् सर्व- कामः ॥२०॥ य ईशे ये भक्षयन्त इतीन्द्राग्नी लोककामः ॥२१॥ अन्नं ददाति प्रथमम् ॥२२॥ पशूपाकरणमुत्तमम् ॥२३॥ सर्वपुरस्ताद्धोमा युज्यन्ते ॥२४॥ दोषो गायेत्यथ- र्वाणं समावृत्त्याश्नाति ॥ २५ ॥ अभयं द्यावापृथिवी श्येनोऽसीति प्रतिदिशं सप्तर्षीनभयकामः ॥२६॥ उत्तरेण दीक्षितस्य वा ब्रह्मचारिणो वा दण्डप्रदानम् ॥ २७॥ द्यौश्च म इति द्यावापृथिव्यौ विरिष्यति ॥२८॥ यो अग्ना-


तक सोते रहने का प्रायश्चित है ॥१८॥ “धाता दधातु०” इत्यादि से मंत्र में कहे हुए देवताओं के नाम आहुति और उपस्थान करे ॥१९॥२०॥ “य ईशे ये भक्षयन्त०” से इन्द्र और अग्निकी आहुतियां एवं उपस्थान करे ॥ सर्वलोकाधिपत्य कामनावाले करें॥२१॥ “अन्नं ददाति०” से अभीष्ट अन्न को अभिमंत्रण करके भिक्षुओंको देवे ॥२२॥ यह पहिले करे ॥२२॥ और पुनः ये पशुका उपाकरण करे ॥२३॥ और सर्वपुरस्तात् होमों को करे ॥२४॥ अथर्वा ऋषि के नाम आहुति एवं उपस्थान करे सर्वलोकाधिपत्य की कामनावाला। गोदानादिक तन्त्रको परिधापनान्त तक करके तब “इदाव- त्सराय०” से आहुति करे । तब अभ्यातानों को करे। फिर “ऋचं साम०” से आहुति करे ॥ अभ्यातानान्त तक करके, “दोषो गाय०” इस सूक्त से भात धर कर अभिमंत्रण करके खावे ॥२५॥ व्रत को समाप्ति कर व्रत को त्याग देवे । “अभयं द्यावापृथिवी०” से जिस ग्राम या नगर को अभय करने की इच्छा हो उसके सब दिशाओं में आहुतियां करे ॥२६॥ ज्योतिष्टोमयज्ञ में दीक्षित पुरुष को ब्रह्मा दण्ड देवे ॥२८॥ यदि नाश होने की बारी आ जावे तो “द्यौश्च म०” से द्यावापृथिवी की आहुति तथा उपस्थान करे ॥२८॥ “यो अग्नौ०” इत्यादि से रुद्रदेवों को आहुतियां