कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १४७ विति रुद्रान् स्वस्त्ययनकामः स्वस्त्ययनकामः ॥२६॥ ॥१०॥५६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥ अग्नीनाधास्यमानः सवान्वा दास्यन् संवत्सरं ब्रह्मोदनिकमग्निं दीपयति ॥१॥ अहोरात्रौ वा ॥२॥ याथाकामी वा ॥३॥ संवत्सरं तु प्रशस्तम् ॥४॥ सवाग्नि- सेनाग्नी तादर्थिकौ निर्मन्थ्यौ वा भवतः ॥५॥ औपासनौ चोभौ हि विज्ञायेते ॥६॥ तस्मिन्देवेहेडनेनाऽर्धं जुहुयात् ॥७॥ समिधोऽभ्यादध्यात् ॥८॥ शकलान् वा ॥६॥ तस्मिन् यथाकामं सवान् ददात्येकं द्वौ सर्वान् वा ॥१०॥ अपि वै- ककमात्माशिषो दातारं वाचयति ॥११॥ पराशिषो ऽनु- मन्त्रणमनिर्दिष्टाशिषञ्च ॥१२॥ दातारौ कर्माणि कुरुतः ॥१३॥ तौ यथालिङ्गमनुमन्त्रयते ॥१४॥ उभयलिङ्गैरूभौ देवे और उपस्थान करे स्वस्त्ययन की इच्छावाला ॥२९॥१०॥५९॥ यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के सप्तम अध्यायका भाषानुवाद पूरा हुआ ॥७॥ अग्नियों को आधान करने की इच्छा वाले, या सवों को देने की इच्छा वाले संवत्सर तक ब्रह्मोदन अग्नि को जलावे ॥१॥ या दो दिन- रात तक ॥२॥ या जितने समय तक इच्छा हो ॥३॥ परन्तु संवत्सर तक का समय सबसे अच्छा है ॥४॥ सवाग्नि और सेनाग्नि, तादर्थिक या निर्मथन से होते हैं ॥५॥ दोनों ही औपासन जान पड़ते हैं ॥६॥ उसमें “देवहेडन०” इत्यादि पूरे अनुवाक से आहुतियाँ करे ॥७॥ समि- धाओं का आधान करे ॥८॥ या शकलों का करे ॥९॥ उसके निमित्त जैसी इच्छा हो सब देवे एक या दो देवे ॥१०॥ अथवा एक २ को दाता को आशिष बचवावे ॥११॥ पर का अनुमंत्रण निर्दिष्ट नहीं है और आशिष का वाचन भी अनिर्दिष्ट है ॥१२॥ दाता दोनों कर्मों को करे ॥१३॥ उन दोनों को यथालिङ्ग अनुमंत्रण करे ॥१४॥ दोनों लिङ्गों से दोनों दाताओं को—पुंलिङ्ग से पुरुष दाता को एवं स्त्रीलिङ्ग से पत्नी