कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । पवित्रैरिति पवित्रे अन्तर्धाय ॥ ३४ ॥ उदकमासिञ्चति ॥३५॥ ब्रह्मणा शुद्धाः संख्याता स्तोका इत्यापस्तासु निक्त्वा तण्डुलानावपति ॥३६॥ उरुः प्रथस्वोद्योधन्तीति श्रपयति ॥३७॥ प्रयच्छ पर्शुमिति दर्भाहाराय दात्रं प्रय- च्छति ॥३८॥ ओषधीर्दान्तु पर्वन्नित्युपरि पर्वणां लुनाति ॥३६॥ नवं बर्हिरिति बर्हिस्तृणाति ॥४०॥ उदेहि वेदिं धर्ता ध्रियस्वेत्युद्वासयति ॥ ४१ ॥ अभ्यावर्त्तस्वेति कु- म्भीं प्रदक्षिणमावर्त्तयति ॥४२॥ वनस्पते स्तीर्णमिति बर्हिषि पात्रीं निदधाति ॥४३॥ अंसश्रीमित्युपदधाति ॥४४॥ उपस्तृणीहीत्याज्येनोपस्तृणाति ॥४५॥ उपास्त- रीरित्यपस्तीर्णामनुमन्त्रयते ॥४६॥२॥६१॥ अदितेर्हस्तां सर्वान् समागा इति मन्त्रोक्तम् ॥१॥ तत उदकमादाय पात्र्यामानयति ॥२॥ दर्व्या कुम्भ्यां ॥३॥ दर्विकृते तत्रैव प्रत्यानयति ॥४॥ दर्व्योत्तममपादाय पवित्र डालकर जल का सेक करे ॥३४॥३५॥ “ब्रह्मणा शुद्धाः संख्याता स्तोका०” से उनमें जल डाल कर चावलों को आवपन करे ॥३६॥ “उरुः प्रथस्वोद्योधन्ति०” से पकावे ॥३७॥ “प्रयच्छ पर्शुं०” दर्भ लाने वाले के लिये हसुआ देवे ॥३८॥ और “ओषधीर्दान्तु पर्वन्०” से दर्भ को गाँठ से ऊपर ही काटे ॥ ३९ ॥ “नवं बर्हिः०” से कुशों को बिछावे ॥४०॥ “उदेहि वेदिं धर्ता ध्रियस्व०” से उद्वासन करे ॥४१॥ “अभ्या- वर्त्तस्व०” से कुम्भी को प्रदक्षिण आवर्तन करे ॥४२॥ “वनस्पते स्तीर्णं०” से कुश पर पात्री को धरे ॥४३॥ “अंसश्रीं०” से रक्खे ॥४४॥ “उपस्तृ- णीहि०” से आज्य से उपस्तीर्ण करे ॥४५॥ “उपास्तरीः” बिछाये हुए को अनुमंत्रण करे ॥४६॥२॥६१॥ यह एकसठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “अदितेर्हस्तां सर्वान्समागा०” से पत्नी को दर्वी पकड़ावे ॥१॥ तब जल लाकर पात्री में लावे ॥२॥ दर्वी से कुम्भी में डाले ॥३॥ उस दर्वी के जल को वहीं लाकर धरे ॥४॥ दर्वी में का लाया जल को, यजमान