भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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दाय तत्सुहृद्दक्षिणतोऽग्नेरुदङ्मुख आसीनो धारयति ॥५॥ अथोद्धरति ॥६॥ उद्धृते यदपादाय धारयति तदु- त्तरार्ध आदधाति ॥७॥ अनुत्तराधरताया ओदनस्य यदुत्तरं तदुत्तरमोदन एवौदनः ॥८॥ षष्ठ्यां शरत्स्विति पश्चादग्नेरुपसादयति ॥९॥ निधिं निधिपा इति त्रीणि काण्डानि करोति ॥१०॥ यद्यज्जायेति मन्त्रोक्तम् ॥११॥ सा पत्यावन्वारभते ॥१२॥ अन्वारब्धेष्वत ऊर्ध्वं करो- ति ॥१३॥ अग्नी रक्ष इति पर्यग्नि करोति ॥१४॥ बभ्रे- रध्वर्यो इदं प्रापमित्युपर्यापानं करोति ॥ १५ ॥ बभ्रे- र्ब्रह्मन्निति ब्रूयादनध्वर्युम् ॥१६॥ घृतेन गात्रा सिञ्च सर्पिरिति सर्पिषा विष्यन्दयति ॥१७॥ वसोर्या धारा आदित्येभ्यो अङ्गिरोभ्य इति रसैरुपसिञ्चति ॥१८॥ प्रियं प्रियाणामित्युत्तरतो ऽग्नेर्धेन्वादीन्यनुमन्त्रयते॥१९॥ताम- त्यासरत्प्रथमेति यथोक्तं दोहयित्वोपसिञ्चति ॥२०॥ अत्यासरत् प्रथमा धोक्ष्यमाण सर्वान् यज्ञान् बिभ्रती का सुहृत् लेकर अग्नि के दक्षिण भाग में उत्तर मुख बैठकर धारण किया रहे ॥५॥ अब उद्धरण करे ॥६॥ अनुत्तराधारता के ओदन के जो उत्तर है वही उत्तर ओदन, ओदन है ॥७॥८॥ “षष्ठ्यां शरत्सु०” से अग्नि के पश्चिम भाग में उसको लाकर धरे ॥९॥ “निधिं निधिपा०” से तीन काण्ड करे ॥१०॥ “यज्जाया०” से मन्त्रोक्त क्रिया करे ॥११॥ पत्नी पति द्वारा अन्वारब्ध होकर कर्म करे ॥ १२ ॥ १३ ॥ “अग्नी रक्ष०” से पर्यग्नि करे ॥१४॥ “बभ्रेरध्वर्यो इदं प्रापं०” से ओदन के ऊपर गर्त्त करे ॥१५॥ “बभ्रेर्ब्रह्मन्०” से अनध्वर्यु को कहे “घृतेन गात्रा सिञ्च सर्पिषि०” से घृत द्वारा विष्यन्दन करे॥१६॥१७॥ “वसोर्या धारा आदि- त्येभ्यो अङ्गिरोभ्यः” से रस द्वारा सिञ्चन करे ॥१८॥ “प्रियं प्रियाणं०” से अग्नि के उत्तर में धेनु आदिकों को अनुमंत्रण करे ॥१९॥ “अत्या- सरत्०” आधी ऋचा से अभिसरन्ती गौ को अनुमंत्रण करे । “उप- २०