भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

१५४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । वैश्वदेवी ॥ उप वत्सं सृजत वाश्यते गौर्व्यसृष्ट सुमना हिंकृणोति ॥ बधान वत्समभि घेहि भुञ्जती निज्य गोधु- गुपसीद दुग्धि । इरामस्मा ओदनं पिन्वमाना कीलालं घृतं मदमन्नभागम् ॥ सा धावतु यमराजः सवत्सा सुदु- घां यथा प्रथमेह दत्ता ॥ अतूर्णदत्ता प्रथमेदमागन् वत्सेन गां संसृज विश्वरूपामिति ॥२१॥ इदं मे ज्योतिः सम- न्नय इति हिरण्यमपिदधाति ॥२२॥ एषा त्वचासिम्य- मोतं वासोऽग्रतः सहिरण्यं निदधाति ॥२३॥३॥६२॥ यत्क्षेप्विति समानवसनौ भवतः ॥ १ ॥ द्वितीयं तत्पापचैलं भवति तन्मनुष्याधमाय दद्यादित्येके ॥२॥ शृतं त्वा हव्यमिति चतुर आर्षेयान् भृग्वङ्गिरोविद उप- वत्सं०” असृष्ट सुमना हिंकृणोति०” से हिंकार करती हुई गौ के छोटे वत्स को बांधे (उसके पैर में बांधे) । “वाश्यते गौः०” से वाश्यमाना गौ को नियुक्त करे । “गोधुगुपसीद०” से ब्राह्मण दूहने के लिये गौ को लावे । “दुग्धि०” इत्यादि पद के साथ आधी ऋचा से गौ को दूहे । “सा धावतु०” आधी ऋचा से छोड़ी हुई गौ को अनुमंत्रण करे । “अतूर्णदत्त०” से आधी ऋचा से पुनः बच्चे के साथ गौ को कर देवे ॥१८॥१९॥२०॥२१॥ इस प्रकार दूह कर, दूध के साथ ओदन को सींच कर “इदं मे ज्योतिः” से दाता को पाद बचवावे, और सोना उसमें डलवावे । दाता सूक्त पढ़कर सबको सम्पातवन्त करे या “श्रा- म्यत” प्रभृति से दाता, पत्नी, अपत्य इनको अन्वारम्भ करावे । और “एषा त्वचा०” इस ऋचा से बुने हुए वस्त्र को आगे धरे उसमें सोना भी धरे ॥२३॥३॥६२॥ यह बासठवी कंडिका समाप्त हुई । “यत्क्षेप्वेषु०” इससे समान वस्त्र पहन ओढ़े दोनों रहे ॥१॥ कोई २ आचार्य कहते हैं कि दूसरा वस्त्र पाप चैल होता है अतएव इसको किसी अधम मनुष्य को देवे ॥२॥ अब अथर्ववेद में ब्राह्मणों को बुलाने का समय । “दाता सोम राजन्०” ऋचा से आर्षेयगुण युक्त चार भृग्व- ङ्गिरोविद् ब्राह्मणों को बुलाकर । “शृतं त्वा हव्यं” से यज्ञ कराने के लिये