भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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१६० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । उपर्यापानम् ॥७॥ तदभितश्चतस्रो दिह्याः कुल्याः ॥८॥ ता रसैः पूरयति ॥६॥ पृथिव्यां सुरयाद्भिराण्‍डीकादिवन्ति मन्त्रोक्तानि प्रतिदिशं निधाय ॥ यमोदनमित्यतिमृ- त्युम् ॥ ११ ॥ अनड्वानित्यनड्वाहम् ॥ १२ ॥ सूर्यस्य रश्मीनिति कर्की सानुबन्ध्यां ददाति ॥ १३ ॥ अयं गौः पृश्निरयं सहस्रमिति पृश्निं गाम् ॥१४॥ देवा इमं मधुना संयुक्तं यवमिति पौनःशिलं मधुमन्थं सहिरण्यं सम्पात- वन्तम् ॥१५॥ पुनन्तु मा देवजनाः इति पवित्रं कृशरम् ॥ १६ ॥ कः पृश्निमित्युर्वराम् ॥१७॥ साहस्र इत्यृषभम् ॥ १८ ॥ प्रजापतिश्चेत्यनड्वाहम् ॥ १६ ॥ नमस्ते जाय- मानायै ददामीति वशामुदपात्रेण सम्पातवता सम्प्रोक्ष्या- भिमन्त्र्याभिनिगद्य दद्याद्दाता वाच्यमानः ॥ २० ॥ भूमिष्ठेत्येनां प्रतिगृह्णाति ॥२१॥ उपमितामिति यच्छ्रा- लया सह दास्यन् भवति तदन्तर्भवत्यपिहितम् ॥२२॥ में प्रति दिशा में पोखर बनावे ॥६॥ और उसके ऊपर गर्त करे ॥७॥ उसके सम्मुख चार दिशा कुल्या करे ॥८॥ उनको रसों से पूरा करे ॥९॥ पृथिवी पर सुरा, जल और आण्डीकादि वाले करे जैसा मंत्र में कहा गया है प्रदिशा में घरे ॥१०॥- “यमोदनं०” से अतिमृत्यु को ॥११॥ “अनड्वान्०” से अनड्वाह को ॥१२॥ ‘सूर्यस्य रश्मीन०’ कर्की सानुबन्ध्या देवे ॥१३॥ “अयं गौः पृश्निरयं सहस्रं०” से पृश्नि गौ को ॥१४॥ “देवा इमं मधुना संयुक्तं यवं०” से पौनः शिलं को, मधुमन्थ को, सोने के साथ सम्पातवन्त करे ॥१५॥ “पुनन्तु मा देवजना०” से कृशर को पवित्र करे ॥१६॥ “कः पृश्नि०” से उर्वरा को और “साहस्रः” से ऋषभ को, “प्रजापतिश्च०” से अनतुहुह को ॥१७॥१८॥१९॥ “नमस्ते जायमानायै ददामि०” से वशा को उदपात्र से सम्पात वाला से संप्रोक्षण करके अभिमंत्रण करके अभिनिगद् करके वाच्यमान दाता देवे ॥२०॥ “भूमिष्ठा०” से इसको प्रतिग्रहण करे ॥२१॥ “उपमितां०” से जिस