भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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लनाचमनमुक्तम् ॥१०॥ पाणावुदकमानीय ॥११॥ अथा- मुष्यौदनस्यावदानानां च मध्यात्पूर्वार्द्धाच्च द्विरवदायोप- रिष्टादुदकेनाभिघार्य जुहोति सोमेन पूतो जठरे सीद ब्रह्मणामार्षेयेषु निदध ओदन स्वेति ॥१२॥ अथ प्राश्ना- ति ॥१३॥ अग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि बृहस्पतेर्मुखेन । इन्द्र- स्य त्वा जठरे सादयामि वरुणस्योदरे । तद्यथा हुत- मिष्टं प्राश्नीयादेवात्मा त्वा प्राश्नाम्यात्मास्यात्मन्नात्मानं मे मा हिंसीरिति प्राशितमनुमन्त्रयते ॥ १४ ॥ योऽग्नि- र्नृमणा नाम ब्राह्मणेषु प्रविष्टः । तस्मिन्म एष सुहुतो- ऽस्त्वोदनः स मा मा हिंसीत्परमे व्योमन् ॥ सो अस्म- भ्यमस्तु परमे व्योमन्निति दातारं वाचयति ॥१५॥ वीक्ष- णान्तं शतौदनायाः प्रातर्जपेन व्याख्यातम् ॥१६॥६॥६५॥ वाङ्ग आसन्निति मन्त्रोक्तान्यभिमन्त्रयते ॥ १ ॥ बृहता मनो द्यौश्च मे पुनर्मैत्विन्द्रियमिति प्रतिमन्त्रयते ॥ २ ॥ प्रतिमन्त्रिते व्यवदायाश्नन्ति ॥ ३ ॥ शतौदनायां द्वादशं शतं दक्षिणाः ॥ ४ ॥ अधिकं ददतः कामप्रं सम्प- द्यते ॥ ५ ॥ ब्रह्मास्येत्योदने हृदान्प्रतिदिशं करोति ॥६॥ गये जानो ॥१०॥ हाथ में जल लाकर ॥११॥ अब अमुष्यौदन के अव- दानों का और मध्य पूर्वार्ध से दो बार लेकर ऊपर से जल से अभिघा- रण कर आहुति देवे । “सोमेन पूतो०” इत्यादि से ॥१२॥ अब प्राशन करे “अग्नेष्ट्वास्येन०” इत्यादि से प्राशन करके अनुमंत्रण करे । “यो- ऽग्निर्नृमणा०” इत्यादि से दाता को बचवावे ॥१३॥१४॥१५॥ शतौद- नाका व्याख्यान वोक्षण तक किया गया जानो ॥१६॥६॥६५॥ यह पैसठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “वाङ्ग आसन्०” से मंत्रों में कहे हुओं का अनुमंत्रण करे ॥१॥ “बृहता मनो०” इत्यादि से प्रतिमंत्रण करे॥२॥ प्रतिमंत्रित होने पर उसे लेकर खावे ॥३॥ शतौदना में १२०० दक्षिणा देनी चाहिये ॥४॥ अधिक देने से “कामप्रं” की प्राप्ति होती है ॥५॥ “ब्रह्मास्य०” से ओदन