भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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१५८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ऽमोतं तस्याग्रतः सहिरण्यं निदधाति ॥२४॥ पञ्च रुक्मेति मत्रोक्तम् ॥ २५ ॥ धेन्वादीन्युत्तरतः सोपधानमास्तरणं वासो हिरण्यञ्च ॥ २६ ॥ आनयतैतमिति सूक्तेन सम्पात- वन्तम् ॥ २७ ॥ आञ्जनान्तं शतौदनायाः पञ्चौदनेन व्याख्यातम् ॥२८॥५॥६४॥ अघायतामित्यत्र मुखमपिनह्यमानमनुमन्त्रयते ॥१॥ सपत्नेषु वज्रं ग्रावा त्वैष इति निपतन्तम् ॥ २ ॥ वेदिष्ट इति मन्त्रोक्तमास्तृणाति ॥ ३ ॥ विंशत्योदनासु श्रय- णीषु शतमवदानानि वध्रीसन्नद्धानि पृथगोदनेषूपर्या- दधति ॥ ४ ॥ मध्यमायाः प्रथमे रन्त्रिण्यामिक्षां दशमेऽभितः सप्तसप्तापूपान् परिश्रयति ॥ ५ ॥ पञ्चदशे पुरोडाशौ ॥ ६ ॥ अग्रे हिरण्यम् ॥७॥ अपो देवी- रित्यग्रत उदकुम्भान् ॥८॥ बालास्त इति सूक्तेन सम्पा- तवतीम् ॥ ९ ॥ प्रदक्षिणमग्निमनुपरीणीयोपवेशनप्रक्षा- अमोत के आगे सोना सहित घरे ॥२४॥ “पञ्च रुक्म०” से मंत्रोक्त करे ॥२५॥ धेनु आदिकों को उत्तर दिशा में उपधान के सहित बिछावन, वस्त्र और सोना देवे ॥२६॥ “आनयतैतं०” इस सूक्त से सम्पात वाले को लावे ॥ २७॥ आञ्जन तक के कर्मों का व्याख्यान शतौदन का पञ्चौदन के साथ किया गया जानो ॥२८॥५॥६४॥ यह चौसठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “अघायतां०” से मुख को बांधने वाले को अनुमंत्रण करे ॥१॥ “सपत्नेषु वज्रं ग्रावा त्वैष०” से गिरते हुए को अनुमंत्रण करे ॥२॥ “वेदिष्ट०” से मंत्रोक्त वस्तु को आस्तरण करे ॥३॥ बीस पकने वाले ओदनों में १०० अवदानों को वध्रीसंनद्धों को, अलग ओदनों पर घरे ॥४॥ मध्यमा के पहिले में रन्त्रिणी आमिक्षा को दशम में सात २ अपूपों को परिश्रयण करे । ५॥ पन्द्रहवें में दो पुरोडाशों को घरे ॥६॥ आगे सोना को ॥७॥ “अपो देवीः” से अग्रभाग में उदकुम्भों को घरे ॥८॥ “बालास्त०” इस सूक्त से सम्पात वाली करे ॥९॥ अग्नि की प्रदक्षिणा करता हुआ अनुपरीणीय, उपवेशन, प्रक्षालन, आचमन कहे