कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १५७ दजानीयमानमनुमन्त्रयते ॥६॥ इन्द्राय भागमित्यग्निं परिणीयमानम् ॥ ७॥ ये नो द्विषन्तीति संज्ञप्यमानम् ॥ ८ ॥ प्रपद् इति पदः प्रक्षालयन्तम् ॥ ६ ॥ अनु छ्य श्यामेनेति यथापरु विशसन्तम् ॥ १० ॥ ऋचा कुम्भी- मित्यधिश्रयन्तम् ॥११॥ आसिञ्चेत्यासिञ्चन्तम् ॥१२॥ अवधेहीत्यवदधतम् ॥ १३ ॥ पर्याधत्तेति पर्यादधतम् ॥ ॥ १४ ॥ शृतो गच्छत्वित्युद्वासयन्तम् ॥ १५ ॥ उत्क्रा- मात इति पश्चादग्नेर्दर्भेषूद्धरन्तम् ॥१६॥ उद्धृतमजमन- ज्मीत्याज्येनानक्ति ॥१७॥ पञ्चौदनमिति मन्त्रोक्तम् ॥१८॥ ओदनान् पृथक्पादेषु निदधाति ॥ १९ ॥ मध्ये पञ्चमम् ॥ २० ॥ दक्षिणं पश्चार्द्धं यूषेनोपसिच्य ॥ २१ ॥ शृत- मजमित्यनुबद्धशिरःपादं श्वेतस्य चर्म ॥ २२ ॥ अजो हीति सूक्तेन सम्पातवन्तं यथोक्तम् ॥ २३ ॥ उत्तरो- दिशा से बकरे को लाते हुए को अनुमंत्रण करे ॥६॥ "इन्द्राय भागं०" से अग्नि को परिणीय करते हुए को अनुमंत्रण करे ॥७॥ "ये नो द्विषन्ति०" से संज्ञपन करने वाले को अनुमंत्रण करे ॥८॥ "प्रपदः" से पैरों को प्रक्षालन करते हुए को अभिमंत्रण करे ॥९॥ परु के अनुसार हनन करने वाले को अनुमंत्रण करे ॥१०॥ "ऋचा कुम्भीं०" से पकाने वाले को अनुमंत्रण करे ॥११॥ "आसिञ्च०" से अभिसिञ्चन करते हुए को अभिमंत्रण करे ॥१२॥ "अवधेहि०" से अवधान करनेवाले को अभिमं- त्रण करे। "पर्याधत्त०" से पर्यादधत को अनुमं० "शृतो गच्छतु०" से उद्वासन करते हुए को अनु० "उत्क्रामत०" से अग्नि के पश्चिम भाग में दर्भों पर उद्धरण करते हुए को अनुमंत्रण करे ॥१३॥१४॥१५॥१६॥ "उद्धृतमजमनज्मि०" से आज्य को मिलावे ॥१७॥ "पञ्चौदनं०" से मन्त्रोक्त करे ॥१८॥ ओदनों को अलग पादों में घरे ॥१९॥ मध्य में पाचवें को घरे ॥२०॥ दक्षिण पश्चार्ध को यूष से उपसेचन करके। "शृतमजं०" से बांधे हुए शिर पैर वाले का यह चर्म है ॥२१॥॥२२॥ "अजो हि०" इस सूक्त से सम्पात वाले को घरे ॥२३॥ उत्तर दिशा में