कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मानः ॥२०॥ अनुवाकेनोत्तरं सम्पातवन्तं करोति ॥२१॥ प्राच्यै त्वा दिश इतिप्रभृतिभिर्वानुवाकेनाभिमन्त्र्याभि- निगद्य दद्याद्दाता वाच्यमानः ॥ २२ ॥ यथासव- मन्यान्पृथग्वेति प्रकृतिः ॥ २३ ॥ सर्वे यथोत्पत्त्या- चार्याणां पञ्चौदनवर्जम् ॥२४॥ प्रयुक्तानां पुनरप्रयोगम् ॥२५॥ एके सहिरण्यां धेनुं दक्षिणां ॥२६॥ गो दक्षिणां वा कौरुपथिः ॥ २७ ॥ सम्पातवतोऽभिमन्त्र्याभिनिगद्य दद्याद्दाता वाच्यमानः ॥ २८ ॥ एतं भागमेतं सधस्था उलूखल इति संस्थितहोमाः ॥ २९ ॥ आपवते ॥ ३० ॥ अनुमन्त्रणं च ॥३१॥४॥६३॥ आशानामिति चतुःशरावम् ॥ १ ॥ यद्राजान इत्यवेक्षति ॥ २ ॥ पदस्नातस्य पृथक्पादेष्वपूपान् निद- धाति ॥३॥ नाभ्यां पञ्चमम् ॥ ४ ॥ उन्नह्यन्वसनेन सहि- रण्यं सम्पातवन्तम् ॥ ५ ॥ आनयैतमित्यपराजिता- दाता देवे ॥२०॥ अनुवाक से उत्तर सम्पातवन्त करे ॥२१॥ “प्राच्यै त्वा दिश०” इत्यादि से, या अनुवाक से अनुमंत्रण करके अभिनिगदन करके वाच्यमानदाता दाता देवे ॥२२॥ या यथासव अन्यों को अलग २ देवे यह 'प्रकृति' है ॥२३॥ कर्मोत्पत्ति पक्ष के सब ही आचार्यों के मत से पञ्चौदन को छोड़ कर है ॥२४॥ प्रयुक्तों का फिर अप्रयोग होगा ॥२५॥ किन्हीं आचार्यों के मत से सोना सहित धेनु दक्षिणा में देवे ऐसा है ॥२६॥ कौरुपथि आचार्य के मत से केवल गौ ही दक्षिणा देवे ॥२७॥ सम्पात वाले को अभिमंत्रण एवं अभिनिगदन करके वाच्यमान दाता देवे ॥२८॥ “एतं भागमेतं सधस्था उलूखलः” से संस्थित होमों को करे ॥२९॥ आवपन और अनुमंत्रण करे ॥३०॥३१॥४॥६३॥ यह तिरसठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ “आशानां०” से चार पुरवा को लाकर घरे ॥१॥ “यद्राजान०” से अवेक्षण करे ॥२॥ पदस्नात के अलग २ पादों पर अपूपों को घरे ॥३॥ नाभि पर पञ्चम को ॥४॥ कपड़े से उन्नहन करता हुआ कपड़े से सोने के साथ सम्पातवन्त को ॥५॥ और “आनयैतं०” से पश्चिम