कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । सम्भृतेषु साविकेषु सम्भारेषु ब्राह्मणमृत्विजं वृणीत ॥ १ ॥ ऋषिमार्षेयं सुधातुदक्षिणमनैमित्तिकम् । एष ह वा ऋषिरार्षेयः सुधातुदक्षिणो यस्य त्र्यवराध्याः पूर्व- पुरुषा विद्याचरणवृत्तशीलसम्पन्नाः ॥ ३ ॥ उदगयन इत्येके ॥ ४ ॥ अथात ओदनसवानामुपाचारकल्पं व्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥ सवान् दत्त्वाग्नीनादधीत ॥ ६ ॥ सार्ववैदिक इत्येके ॥ ७ ॥ सर्वे वेदा द्विकल्पाः ॥ ८ ॥ “यमोदनं०” इस सूक्त से अतिमृत्यु सव को ॥९॥ “अनद्वान्दधार०” इस सूक्त से अनडुह सव को ॥१०॥ “सूर्यस्य रश्मीन्०” इस सूक्त के तीन ऋचाओं द्वारा कर्क सव ॥११॥ “आयं गौः” इस सूक्त की तीन ऋचाओं से पृश्नि सव ॥१२॥ “अयं सहस्रं०” इन दो ऋचाओं से पृश्नि गौ सव ॥१३॥ “देवा इमं०” इस ऋचा से पौनःशिल सव ॥१४॥ “पुन- न्तु मा०” इस सूक्त से पवित्र सव को ॥१५॥ “कः पृश्निं०” ऋचा से उर्वरा सव ॥१६॥ “साहस्र त्वेष०” इस सूक्त से ऋषभ सव ॥१७॥ “प्रजापतिश्च०” सूक्त से अनडुह सव ॥१८॥ “नमस्ते जायमानायै” इस अर्थ सूक्त से वशा सव ॥१९॥ “ददामि०” इस अनुवाक से वशासव ॥२०॥ “उपमितां०” इस अर्थ सूक्त से शालासव ॥२१॥ “तस्यौदनस्य०” इस अर्थ सूक्त से बृहस्पति सव ॥२२॥ अभिचार काम का ॥२३॥ बाईस सव यज्ञ संहिता में पढ़े जाते हैं । स्वर्गौदनतन्त्र से सब सव यज्ञों को करे या ब्रह्मौदन तंत्र से; क्योंकि स्वर्गब्रह्मौदन दोनों तन्त्र ( प्रक्रियायें ) हैं ॥७।६६॥ यह छियासठवी कंडिका समाप्त हुई ॥ ओदन यज्ञ के लिये सामग्रियों के जुट जाने पर ब्राह्मण ऋत्विज को वरण करे ॥१॥ इन्हीं ऋषि को जिनमें आर्षेय गुण सम्पन्न हैं, वह हैं सुधातु दक्षिण, इन्हीं विना निमित्त वरण करना चाहिये ॥२॥ या यही ऋषि आर्षेय सुधातु दक्षिण हैं जिनके तीन से अधिक ·पूर्व पुरुष विद्या, आचरण, वृत्त, शील से सम्पन्न हुए हैं ॥३॥ इस यज्ञ के लिये उत्तरा- यण है—ऐसा अनेक आचार्यों की सम्मति है ॥४॥ अब ओदन सवों का उपचार कल्प कहेंगे ॥५॥ सवों को देकर अग्नि का आधान करे ॥६॥ सार्ववैदिक—यह है ऐसा बहुत से आचार्य कहते हैं ॥७॥ सब ही वेद