कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६३ मासपरार्ध्या दीक्षा द्वादशरात्रो वा ॥ ९ ॥ त्रिरात्र इत्येके ॥ १० ॥ हविष्यभक्षाः स्युर्ब्रह्मचारिणः ॥११॥ अधः शयीरन् ॥१२॥ कर्तृदातारौवा समापनात्कामं न भुञ्जीरन् सन्तताश्चेत् स्युः ॥१३ अहनि समाप्तमित्येके ॥१४॥ यात्रार्थं दातारौ वा दाता केशश्मश्रुरोमनखानि वापयीत ॥१५॥ केशवर्जं पत्नी ॥१६॥ स्नातावहतवसनौ सुरभिणौ व्रतवन्तौ कर्मण्यावुपवस्तः ॥१७॥ श्वो भूते यज्ञोपवीती शान्त्युदकं कृत्वा यज्ञवास्तु च सम्प्रोक्ष्य ब्रह्मोदनिकमग्निं मथित्वा ॥ १८ ॥ यद्देवा देवहेडनं यद्विद्वांसो यदविद्वांसोऽपमित्यप्रतीतमित्येतैस्त्रिभिः सूक्तैरन्वारब्धे दातरि पूर्णहोमं जुहुयात् ॥१९॥ पूर्वाह्ने बाह्यतः शान्तवृक्षस्यैध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥२०॥ परि- समूह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचर- द्विकल्प हैं ॥८॥ मास, पक्ष या १२ रात्र तक दीक्षा ग्रहण करे ॥९॥ किन्हीं के मत में तीन रात ॥१०॥ ब्रह्मचारी दीक्षाकाल में हविष्य भक्षण करे ॥११॥ भूमि पर सोवे ॥१२॥ कर्त्ता और दाता बिना समाप्ति के अपनी इच्छा से भोजन न करे; यदि लगातार कार्य्य हों ॥१३॥ दिन ही में समाप्त करें—किन्हीं की सम्मत्ति है ॥१४॥ यात्रा के प्रयोजन से दाता पति पत्नी केश, श्मश्रु, रोम और नखों को कटवावे ॥१५॥ केश को छोड़ कर पत्नी ( केवल नख कटवावे ) ॥१६॥ स्नान करके अखण्ड नये वस्त्रों को पहन कर सुगन्ध चन्दनादि अनुलेपन कर, व्रती होकर कर्म निमित्त उपवास रहें ॥१७॥ प्रातः होने पर यज्ञोपवीती हो शान्त्युदक करके और यज्ञवास्तु को संप्रोक्षण करके ब्रह्मोदनिक अग्नि को मथ कर ॥१८॥ "यद्देवा देवहेडनं, यद्विद्वांसो यदविद्वांसोऽपं०" और "अप्रतीत्तं०" इत्यादि तीनों सूक्तों से दाता के अन्वारब्ध करने पर पूर्ण होम करें ॥१९॥ पूर्वाह्न समय बाहर से शान्तवृक्ष के इध्मों को पूर्व कर उपसमाधान करके ॥२०॥ परिसमूहन, पर्युक्षण और परिस्तरण करके कुश,