कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 196, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
णेनाज्यं परिचर्य ॥२१॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्य- भागौ च ॥२२॥ पश्चादग्नेः पल्पूलितविहितमौक्षं वान- डुहं वा रोहितं चर्म प्राग्ग्रीवमुत्तरलोम परिस्तीर्य ॥२३॥ पवित्रे कुरुते ॥२४॥ दर्भावप्रच्छन्नप्रान्तौ प्रक्षाल्यानुलोम- मनुमार्ष्टि ॥२५॥ दक्षिणं जान्वाच्यापराजिताभिमुखः प्रह्वो वा मुष्टिना प्रसृतिनाञ्जलिना यस्यां श्रपयिष्य- न्त्स्यात्तया चतुर्थम् ॥२६॥ शरावेण चतुःशरावं देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऋषिभ्यस्त्वार्षेयेभ्यस्त्वैकर्षये त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥२७॥८॥६७॥ वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा निर्वपन्तु । ऊर्जमक्षित- मक्षीयमाणमुपजीव्यासमिति दातारं वाचयति ॥१॥ रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा । आदित्यास्त्वा जागतेन च्छन्दसा । विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा निर्वपन्तु । ऊर्जमक्षितमक्षीयमाणमुपजीव्यासमिति दातारं वाच- यति ॥२॥ निरुप्तं सूक्तेनाभिमृशति ॥३॥ स्वर्गब्रह्मौदनौ
और उदपात्र को लाकर परिचरण आज्य को ठीक करके ॥२१॥ नित्य पुरस्तात् होमों को करके और आज्य की दो आहुति करके ॥२२॥ अग्नि के पश्चिम पल्पूलित विहित औक्ष या अनड्भान का लाल चर्म प्राग्ग्रीव उत्तर लोम कर बिछावे । पवित्रे से मार्जन करे ॥२३॥२४॥ बिना टूटे दो दर्भों को प्रक्षालन करके अनुलोमों को मार्जन करे ॥२५॥ दहिने जंघे को टेक कर पश्चिमाभिमुख हो निहुड़ कर या मुट्ठी से अंजुलि पसार कर जिसमें पकाना होगा उसके चौथे को ॥२६॥ पुरवा से “चतुःशरावं देवस्य त्वा सवितुः” इत्यादि से निर्वपन करे ॥२७॥८॥६७॥ यह सदसठवि कंडिका समाप्त हुई ॥ “वसवस्त्वा० इत्यादि आहुति करके दाता से “ऊर्जमक्षित०” इत्यादि बचवावे ॥१॥ “रुद्रास्त्वा०” इत्यादि से आहुति देकर दाता को “ऊर्जमक्षित०” इत्यादि को बचवावे ॥२॥ आहुति शेष को सूक्त से अभि- मर्शन करे ॥३॥ स्वर्ग और ब्रह्मौदन तन्त्र से कर्म करे ॥४॥ ( यदि एक