भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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१६८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ग्निमाधास्यन् ॥१॥ अमावास्यायां पूर्वस्मिन्नुपशाले गां द्विहायनीं रोहिणीमेकरूपां बन्धयति ॥२॥ निशि शामूल- परिहितो ज्येष्ठोऽन्वालभते ॥३॥ पत्न्यहतवसना ज्येष्ठम् ॥४॥ पत्नीमन्वञ्च इतरे ॥५॥ अथैनानभिव्याहारयत्य- ध्रिगो शमीध्वम् ॥ सुशमि शमीध्वम् । शमीध्वमध्रिगा३उ इति त्रिः ॥६॥ अयमग्निः सत्पतिर्नेडमारोहेत्यनुवाकं महाशान्तिं च शान्त्युदक आवपते ॥७॥ अग्ने अक्रव्या- दिति भ्रष्ट्राद्दीपं धारयति ॥८॥ भूमेश्चोपद्ग्धं समुत्खाय ॥९॥ आकृतिलोष्टवल्मीकेनास्तीर्य ॥१०॥ शकृत्पिण्डे- नाभिलिप्य ॥११॥ सिकताभिः प्रकीर्याभ्युक्ष्य ॥१२॥ लक्षणं कृत्वा ॥१३॥ पुनरभ्युक्ष्य ॥१४॥ पश्चाल्लक्षणस्या- भिमन्थनं निधाय ॥१५॥ गोऽश्वाजावीनां पुंसां लोम- भिरास्तीर्य व्रीहियवैश्च शकृत्पिण्डमभिविमृज्य प्राञ्चौ पुत्रों में न हुआ हो तो उसमें ज्येष्ठ पुत्र पिता के स्थान में अधिकारी होगा। उस घर के औपासन अग्नि करने की इच्छा वाला अमावास्या तिथि को शाला के पूर्व स्थान में—उपशाला में दो वर्ष की गौ को जो, रोहिणी एक रंग की हो उसको बांधे ॥१॥२॥ रात्रि में शामूल पहन कर ज्येष्ठ पुत्र अन्वालम्भन करे ॥३॥ पत्नी अखण्ड नये वस्त्र को पहन कर ज्येष्ठ को और इतर पुरुष पत्नी को अन्वञ्च करे ॥४॥५॥ अब पत्नी को अभि- व्याहार करे "अध्रिगो शमीध्वम्। सुशमीध्वम्। शमीध्वमध्रिगा३उ०" तीन् बार कहे ॥६॥ "अयमग्निः सत्पतिर्नेडमारोहे०" इस अनुवाक से महा- शान्ति को और शान्त्युदक में आवपन करे ॥७॥ "अग्ने अक्रव्यात्०" से भडभूँजे के घर से अग्नि लाकर धारण करे ॥८॥ और अदग्ध भूमि को खनन कर जोते खेत की मिट्टी और दीमक की मिट्टी से भरकर बराबर करे ॥९॥१०॥ एवं गोबर से लीपकर बालु से छीट कर अभ्यु- क्षण करके उस पर रेखा खैंचे ॥११॥१२॥१३॥ पुनः अभ्युक्षण करके रेखा के पश्चिम भाग में अग्नि मन्थन को धरे ॥१४॥१५॥ गौ, घोड़ा, या बकरे (पुरुष) के लोमों से आस्तरण कर व्रीहि और जौ से गोबर