भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६७

अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सुमनो भवेत्या- ज्याभागौ ॥३१॥ पाणावुदकमानयेत्युक्तम् ॥३२॥ प्रति- मन्त्रणान्तम् ॥३३॥ प्रतिमन्त्रिते व्यवदायाशनन्ति ॥३४॥ इदावत्सरायेति व्रतविसर्जनमाज्यं जुहुयात् ॥३५॥ समिधोऽभ्यादध्यात् ॥३६॥ तत्र श्लोकौ । यजुषा मथिते अग्नौ यजुषोपसमाहिते ॥ सवान् दत्त्वा सवाग्नेस्तु कथमुत्सर्जनं भवेत् ॥ वाचयित्वा सवान् सर्वान् प्रति- गृह्य यथाविधि ॥ हुत्वा सन्नतिभिस्तत्रोत्सर्गं कौशिकोऽ- ब्रवीत् ॥३७॥ प्राञ्चोऽपराजितां वा दिशमवभृथाय व्रजन्ति ॥३८॥ अपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिणमावृत्याप उपस्पृश्यान- वेक्षमाणाः प्रत्युदाव्रजन्ति ॥३६॥ ब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्स- न्ति ॥४०॥ यथोक्ता दक्षिणा यथोक्ता दक्षिणा ॥४१।६।६८॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥८॥ पित्र्यमग्निं शमयिष्यञ्ज्येष्ठस्य चाविभक्तिन एका- आहुतियाँ करे ॥३१॥ हाथ में जल लावे यह कहा गया ॥३२॥ प्रति मंत्रण के अन्त में ॥३३॥ प्रतिमंत्रण करके लाकर भोजन करे ॥३४॥ “इदावत्सराय०” से व्रत का विसर्जन और आज्य की आहुति देवे ॥३५॥ समिधों को डाले ॥३६॥ इसमें श्लोक हैं । यजुर्वेद के मंत्र से अग्नि में मथन हुआ और उसीके मंत्र से अग्नि में आहुति हुई । सवों को देकर कैसे सवाग्नि का उत्सर्जन हो । सब सवों को बचवा कर यथाविधि प्रतिग्रहण कर और संनति ऋचाओं से आहुति देकर वहाँ उत्सर्जन होगा—यह कौशिकाचार्य कहते हैं ॥३७॥ पूर्व या पश्चिम में अवभृथ के लिये जावें ॥३८॥ अपां सूक्तों से नहाकर प्रदक्षिण घूमकर जल छूकर पीछे को न देखते हुए वापस आवें ॥३९॥ ब्राह्मणों को यथेच्छ भोजन करावें ॥४०॥ और यथोक्त दक्षिणा देवें ॥४१॥९॥६८॥ अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के अष्टम अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥ ८ ॥ जिस घर का पिता मर जावे और उसकी सम्पत्ति का बाट उसके