कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मृड्ढ्वमित्यभ्यवनेजयति ॥१६॥ कृष्णोर्णया पाणि- पादान्निमृज्य ॥१७॥ इमा जीवा उदीचीनैरिति मन्त्रो- क्तम् ॥१८॥ त्रिः सप्तेति कूच्या पदानि घोपयित्वा नदी- भ्यः ॥१९॥ मृत्योः पदमिति द्वितीयाया नावः ॥२०॥ परं मृत्यो इति प्राग्दक्षिणं कूर्दी प्रविध्य ॥२१॥ सप्त नदीरू- पाणि कारयित्वोदकेन पूरयित्वा ॥२२॥ आरोहत सवि- तुर्नावमेतां सुत्रामाणं महीमृष्विति सहिरण्यां सयवां नावमारोहयति ॥२३॥ अश्मन्वती रीयत उत्तिष्ठता प्र तरता सखाय इत्युदीचस्तारयति ॥२४॥३॥७१॥ उत्तरतो गर्त उदक्प्रस्रवणेऽश्मानं निदधात्यन्तरिछ- त्रम् ॥१॥ तिरो मृत्युमित्यश्मानमतिक्रामति ॥२॥ ता अधरादुदीचीरित्यनुमन्त्रयते ॥३॥ निस्सालामिति शा- लानिवेशनं सम्प्रोक्ष्य ॥४॥ ऊर्जं बिभ्रदिति प्रपादयति को देवे ॥१५॥ “अस्मिन्यं०” से अभ्यवनेजन करे ॥१६॥ काले सूत से हाथ पैर को निमार्जन करके ॥१७॥ “इमा जीवा उदीचीनैः” से पूर्व मुख आवें ॥१८॥ “त्रिःसप्त०” से कूदी से पगों को छिपा कर नदियों तक जावे ॥१९॥ “मृत्योः पदं०” द्वितीया कूदीसे पैरों को छिपाकर सात नदी नाव तक जावे ॥२०॥ पूर्व दक्षिण कोण में कूदी को फेक देवे । “परं मृत्योः पदं०” मंत्र पढ़कर ॥२१॥ सात नदियों समान रूप बनाकर उनको जल से भर देवे ॥२२॥ “आरोहत सवितुः” इत्यादि से नाव पर सोना में जौ मिलाकर नाव पर डालकर तब उस पर चढ़े ॥२३॥ “अश्मन्वती०” इत्यादि को जपता हुआ नाव में बैठे और उत्तर की ओर पार होवे ॥२४॥३॥७१॥ यह एकहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई । उस गर्त के उत्तर ढालुआ भूमि में पत्थर को जल में धरे ॥१॥ “तिरो मृत्युं०” से पत्थर पर चढ़े ॥२॥ “ता अधरादुदीचीः” से अनु- मंत्रण करे ॥३॥ “निःसालां०” से शाला के घरको संप्रोक्षण करके ॥४॥ “ऊर्जं बिभ्रत०” से सब लोग शाला में प्रवेश करें । कोई २