कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । समतीते सन्धिवर्णेऽथ हावयेत्सुसमिद्धे पावक आहुती- र्बहिः ॥१॥ अग्नये च प्रजापतये च रात्रावादित्यश्च दिवा प्रजापतिश्च। उदकं च समिधश्च होमे होमे पुरो वरम् ॥२॥ होम्यैः समिद्भिः पयसा स्थालीपाकेन सर्पिषा सायम्प्रात- र्होम एतेषामेकेनापि सिध्यति ॥३॥ अभ्युद्धृतो हुतोऽग्निः प्रमादादुपशाम्यति । मथिते व्याहृतोर्जुहुयात् पूर्णहोमौ यथर्त्विजौ ॥४॥ वनस्पतिभ्यो वानस्पत्येभ्य ओषधि- भ्यो वीरुद्भ्यः सर्वेभ्यो देवेभ्यो देवजनेभ्यः पुण्यज- नेभ्य इति प्राचीनं तदुदकं निनीयते ॥५॥ स्वधा प्रपिताम- हेभ्यः स्वधा पितामहेभ्यः स्वधा पितृभ्य इति दक्षिणतः॥६॥ तार्क्ष्यायारिष्टनेमयेऽमृतं मह्यमिति पश्चात् ॥६॥ सोमाय सप्तर्षिभ्य इत्युत्तरतः ॥८॥ परिमृष्टे परिलिप्ते च पर्वणि व्रातपतं हावयेदन्नमग्नौ। भूयो दत्त्वा स्वयमल्पं च भुक्त्वा जब सूर्योदय और सूर्यास्त के समय घर की स्त्री (मालकिनी) अपने हाथों को जल से धोकर, शौचादि से निवृत्त होके शुद्ध हाथों से अग्नि को जगावे ॥ और दोनों सन्धिकाल बीत जावे तो घरके बाहर अग्नि में आहुतियाँ देवे ॥१॥ रात्रि में "अग्नये च प्रजापतये च"। और दिन में आदित्य प्रजापति के नाम आहुतियाँ करे। जल और समिद् प्रत्येक होम में पूरे और उत्तम लावे ॥२॥ होम करने की वस्तु समिद्, दूध, स्थालीपाक और घृत। सायं प्रातः इनकी आहुति करे या इनमें से किसी एक से करे ॥३॥ अभ्युद्धृत, यदि प्रमाद से बुत जावे तो, अरणियों द्वारा मथितोत्पन्न अग्नि में व्याहृति से और पूर्ण होम भी करे जैसा दोनों ऋत्विज कहें ॥४॥ "वनस्पतिभ्यो" इत्यादि से पूर्व की ओर आहुतियाँ करे और जल लावे ॥५॥ और "स्वधा प्रपितामहेभ्यः" इत्यादि से दक्षिण में, "तार्क्ष्याय०" से पश्चिम दिशा में और "सोमाय सप्तर्षिभ्यः" से उत्तर दिशा में आहुतियाँ देवे ॥६॥७॥८॥ मार्जन और लीपने पर (भूमिको) व्रतपतिको अन्न की आहुति अग्नि में करे॥ थोड़ा या बहुत दूसरों को अन्न देकर आप भोजन अपराह्न में करे—यह याज्ञिक व्रत है ॥९॥