कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मन्त्रविज्जुहुयान्नाविपश्चित् ॥१७॥ बीभत्सवः शुचि- कामा हि देवा नाश्रद्दधानस्य हविर्जुषन्ते । ब्राह्मणेन ब्रह्मविदा तु हावयेन्न स्त्रीहुतं शूद्रहुतं च देवगम् ॥१८॥ यस्तु विद्यादाज्यभागौ यज्ञान्मन्त्रपरिक्रमान् । देवता- ज्ञानमावृत आशिषश्च कर्म स्त्रिया अप्रतिषिद्धमाहुः ॥१९॥५॥७३॥ तयोर्बलिहरणम् ॥१॥ अग्नय इन्द्राग्निभ्यां वास्तोष्प- तये प्रजापतयेऽनुमतय इति हुत्वा ॥२॥ निष्क्रम्य बहिः प्रचीनं ब्रह्मणे वैश्रवणाय विश्वेभ्यो देवेभ्यः सर्वेभ्यो देवे- भ्यो विश्वेभ्यो भूतेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति बहुशो बलिं हरेत् ॥३॥ द्विः प्रोक्षन्प्रदक्षिणमावृत्यान्तरुपातीह्य द्वारे ॥४॥ द्वार्ययोर्मृत्यवे धर्माधर्माभ्याम् ॥५॥ उदधाने धन्वन्तरये समुद्राद्यौषधिवनस्पतिभ्यो द्यावापृथिवीभ्या- हाथ, न विना मंत्रजाने और न अपण्डित आहुतियाँ करे ॥ १७ ॥ देव- गण बिभत्सु, और शुचि की कामना वाले होते हैं इसलिये श्रद्धाहीन व्यक्ति की आहुति नहीं ग्रहण करते हैं । ब्राह्मण और ब्रह्म के जानने वाले से ही हवन करावे । स्त्री एवं शूद्र की दी आहुतियाँ देवताओं तक नहीं पहुँचतीं ॥१८॥ जो आज्यभागों को जानता है, यज्ञों को और मंत्रपरि- क्रमों को एवं देवताज्ञान से आवृत्त हो और आशीर्वाद देना जानता हो ॥ इनके करने का अधिकार स्त्रियों को नहीं है ॥१९॥५॥७३॥ यह तिहत्तरवी कण्डिका समाप्त हुई । स्त्री पुरुष के बलि हरण को कहते हैं । गृही के घर जो कुछ अन्न दोनों समय खाने के लिये पकता है—उस अन्न से देवतादिकों के लिये उपहार दिया जाता है उसको बलि कहते हैं ॥ “अग्नय०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ घर से बाहर होकर, पूर्व दिशा में पूर्वमुख हो “ब्रह्मणे०” इत्यादि से बहुत बलि देवे ॥३॥ दो वार प्रदक्षिण घुम २ कर दोनों द्वार पर “धर्माधर्माभ्याम्” से बलियाँ देवे ॥४॥५॥ जलधरने के स्थान में “धन्वन्तरये०” इत्यादि से बलियाँ देवे ॥६॥ इसी प्रकार