भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७९

मिति ॥६॥ स्थूणावंशयोर्दिग्भ्योऽन्तर्देशेभ्य इति ॥७॥ स्रक्तिषु वासुकये चित्रसेनाय चित्ररथाय तक्षोपतक्षाभ्या- मिति ॥८॥ समन्तमग्नेराशायै श्रद्धायै मेधायै श्रियै ह्रियै विद्याया इति ॥९॥ प्राचीनमग्नेः गृहाभ्यो देवजा मिभ्य इति ॥१०॥ भूयोऽभ्युद्धृत्य ब्राह्मणान् भोजयेत् ॥११॥ तदपि श्लोको वदति ॥ मा ब्राह्मणाग्रतः कृतमश्नी- याद्द्विषवदन्नमन्नकाम्या । देवानां देवो ब्राह्मणो भावो नामैष देवतेति ॥१२॥ आग्रयणे शान्त्युदकं कृत्वा यथर्तु तण्डुलानुपसाद्य ॥१३॥ अप्सु स्थालीपाकं श्रपयित्वा पयसि वा ॥१४॥ सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूरग्नये स्वाहा । सजूरिन्द्राग्निभ्यां सजूर्द्यावापृथिवीभ्यां सजूर्विश्वे- भ्यो देवेभ्यः सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूः सोमाय स्वाहेत्येकहविर्वा स्यान्नाना हवींषि वा ॥१५॥ सौम्यं तन्व- च्छ्यामाकं शरदि ॥१६॥ अथ यजमानः प्राशित्रं गृहीते ॥१७॥ प्रजापतेष्ट्वा ग्रहं गृह्णामि । मह्यं भूत्यै मह्यं पुष्ट्यै “स्थूणावंशयोर्दिग्भ्योऽन्तर्देशेभ्यः” । बलियाँ देवे ॥७॥ चार दिशाओं के कोणों में—“वासुकये०” इत्यादि से बलि देवे ॥८॥ और अग्नि के चारों ओर “श्रद्धायै” इत्यादि से बलि देवे ॥९॥ अग्नि के पूर्व भाग में “गृहा- भ्यो देवजामिभ्यः” से बलि देवे ॥१०॥ अधिक अन्न निकाल कर ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥११॥ इसको भी श्लोक कहता है—ब्राह्मण के भोजन करने के पहिले गृही भोजन न करे क्योंकि वह अन्न विष के समान हो जाता है । देवताओं का देव ब्राह्मण हैं, यह भावमय देवता है ॥१२॥ अग्रहण मास में शान्त्युदक करके यथर्तु तण्डुलों को लाकर जल या दूध में स्थालीपाक पकाकर “सजूरृतुभिः” इत्यादि आहुतियाँ एक हवि की देवे या विभिन्न हवियों की हों ॥१५॥ शरदऋतु में सौम्य श्यामाक की आहुति ॥१६॥ अब यजमान प्राशित्र ग्रहण करे ॥१७॥ “प्रजापतेष्ट्वा०” इत्यादि मन्त्र से ग्रहण करे ॥१८॥ अब प्राशन करे