कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंमह्यं श्रियै मह्यं ह्रियै मह्यं यशसे मह्यमायुषे मह्यमन्नाय मह्यमन्नाद्याय मह्यं सहस्रपोषाय मह्यमपरिमितपोषाये- ति ॥१८॥ अथ प्राश्नाति । भद्रान्नः श्रेयः समनैष्ट देवा- स्त्वयावसेन समशीमहि त्वा । स नः पितो मधुमाँ- आविवेश शिवस्तोकाय तन्वो न एहीति ॥१९॥ प्राशित- मनुमन्त्रयते । अमोऽसि प्राण तद्ऋतं ब्रवीम्यमासि सर्वा- ङसि प्रविष्टः । स मे जरां रोगमपनुद्य शरीरादनामयैधि मा रिषाम इन्दो इति ॥२०॥ वत्सः प्रथमजो ग्रीष्मे वासः शरदि दक्षिणा ॥२१॥ शक्त्या वा दक्षिणां दद्यात् ॥२२॥ नातिशक्तिर्विधीयते नातिशक्तिर्विधीयत इति ॥२३॥ ॥६॥७४॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥ अथ विवाहः ॥१॥ ऊर्ध्वं कार्त्तिक्या आ वैशाख्याः ॥२॥ यथाकामी वा ॥३॥ चित्रापक्षं तु वर्जयेत् ॥४॥ “भद्रान्नः श्रेयः” इत्यादि से प्राशन करके अनुमंत्रण करे—“अमोऽसि प्राण०” इत्यादि ॥१९॥२०॥ ग्रीष्मऋतु में वत्स देवे और शरद्ऋतु में दक्षिणा वस्त्र देवे ॥२१॥ या जैसी शक्ति हो वैसी दक्षिणा देवे ॥ २२ ॥ शक्ति के बाहर अधिक न देवे—॥२३॥६॥७४॥ यह चौहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ॥ अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के नवम अध्यायका भाषानुवाद पूरा हुआ ॥९॥ अब विवाह के विषय में उपदेश करेंगे । विवाह के लिये उपयुक्त सामग्रियां पहिले से एकत्र कर रक्खे । जैसे खिचड़ी, सम्पुट, पाकर- वृक्ष की शाखा, कलश, सर्वौषधि, दही, जेठीमधु, विष्टर, अर्घपात्र, मधुपर्कपात्र, धूसर, पालो, इत्यादि ॥१॥ कार्त्तिक मास से वैशाख मास तक विवाह करने का समय हो ॥ या जब चाहे तब विवाह करे ॥२॥३॥