भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८१ मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्युह्यत इति विज्ञायते मङ्गलञ्च ॥५॥ सत्येनोत्तभिता पूर्वापरमित्युपदधीत ॥६॥ पतिवेदनं च ॥७॥ युवं भगमिति संभलं सानुचरं प्रहि- णोति ॥८॥ ब्रह्मणस्पत इति ब्रह्माणम् ॥९॥ तद्विवृहा- च्छङ्कमानो निशि कुमारीकुलाद्वलीकान्यादीप्य ॥१०॥ देवा अग्र इति पञ्चभिः सकृत्पूल्यान्यावापयति ॥११॥ अनृक्षरा इति कुमारीपालं प्रहिणोति ॥१२॥ उदाहारस्य प्रतिहितेषुरग्रतो जघनतो ब्रह्मा ॥१३॥ यो अनिध्म चित्रानक्षत्र में विवाह न करे ॥४॥ आर्ष विवाह में कन्या वाले को एक या दो गौ, या एक बैल या दो बैल देना किन्हीं आचार्यों का मत है । सो आर्ष विवाह में कन्या वालों को देने केलिये यदि गो मिथुन किसी से उसके घर से पति के घर लाने के लिये कैसे ही लाने पड़ें तो मघा नक्षत्र में लेवे और आर्ष विवाह भी मघा नक्षत्र में करे और सेनाव्यूह के लिये और आर्ष विवाह की बहू को उसके घर से लाने के लिये, ३ पूर्वा फाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र श्रेष्ठ हैं और मंगल भी है ॥५॥ “सत्येनोत्तभिता०” इत्यादि १६ मंत्र और “पूर्वापरं०” इत्यादि दो इन १८ मंत्रों से आज्य की आहुतियां देवे ॥६॥ “आनो अग्न”इत्यादि सूक्त से आगम कृशर दूसरे घर से तिल मिला हुआ लाकर घरे और उसे अभिमंत्रितकर कुमारी को उस भात को चखवावे ॥७॥ और “युवं भगं०” इत्यादि से शोभन अलंकृत पुरुषको संचर हस्त नौकर सहित को लावे ॥८॥ “ब्रह्मणस्पत०”इत्यादि से कुमारी के पास भेजकर वर के गुणों को कहवावे ॥९॥ यदि ब्रह्मा को रात्रि में शङ्का ( भय ) हो तो कुमारी के घर दीप जलाकर “देवा अग्र०” इत्यादि ५ मंत्रों से एकपूल्या की आहुति करे ॥१०॥११॥ “अनृक्षरा०” से कुमारी रक्षा के लिये भेजे । यदि वह १० वर्ष से अधिक उमर की हो तो “देवा अग्र०” इत्यादि ५ मंत्रों से कुमारी लाजा की एक आहुति देवे । कुमारी की रक्षा के लिये धनुर्धारी पुरुष को लावे । आगे २ धनुर्धर, पीछे २ आचार्य और बीच में जल लिया हुआ-उदक हार ॥१२॥१३॥ जल के पास जाकर “यो